Anmol Sandesh News Desk, रायपुर।
CM Sai Bastar Dussehra 2026: छत्तीसगढ़ की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और ऐतिहासिक परंपराओं के प्रतीक बस्तर दशहरे को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। इसी कड़ी में बस्तर दशहरा समिति के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से सौजन्य मुलाकात कर उन्हें इस ऐतिहासिक पर्व में शामिल होने का आमंत्रण दिया। इस दौरान समिति के सदस्यों ने पारंपरिक पागा पहनाकर मुख्यमंत्री का सम्मान किया।
मुख्यमंत्री साय ने आमंत्रण के लिए समिति के प्रतिनिधियों का आभार व्यक्त किया। बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी विशेषता यह है कि यह उत्सव सामान्य दशहरे की तरह केवल कुछ दिनों तक नहीं, बल्कि लगभग 75 दिनों तक विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और पारंपरिक आयोजनों के साथ मनाया जाता है।
इस पर्व में बस्तर की जनजातीय परंपराओं, स्थानीय देवी-देवताओं के प्रति आस्था और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिलती है।
75 दिनों तक चलता है बस्तर दशहरा
बस्तर दशहरा देश के सबसे लंबे समय तक चलने वाले दशहरा उत्सवों में गिना जाता है। इसकी शुरुआत श्रावण मास में हरियाली अमावस्या के आसपास होती है और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के बाद आश्विन मास में इसका समापन होता है।
इस दौरान रथ परंपरा, पूजा-पाठ, देवी आराधना और स्थानीय रीति-रिवाजों से जुड़े कई आयोजन होते हैं। उत्सव में बस्तर के अलग-अलग क्षेत्रों से लोग भाग लेते हैं और अपनी परंपराओं को आगे बढ़ाते हैं।
बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह स्थानीय समुदायों की एकजुटता, सांस्कृतिक पहचान और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं का प्रतीक भी है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भी दिया गया आमंत्रण
बस्तर दशहरे की राष्ट्रीय पहचान को देखते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भी इस ऐतिहासिक पर्व में शामिल होने के लिए आमंत्रित किए जाने की जानकारी सामने आई है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू और छत्तीसगढ़ के संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने नई दिल्ली में राष्ट्रपति से मुलाकात कर उन्हें बस्तर दशहरे में शामिल होने का निमंत्रण दिया।
राष्ट्रपति को आमंत्रित करने की पहल से इस जनजातीय सांस्कृतिक उत्सव को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक पहचान मिलने की उम्मीद है। हालांकि, राष्ट्रपति की उपस्थिति और कार्यक्रम में उनकी भागीदारी की पुष्टि आधिकारिक कार्यक्रम से की जानी चाहिए।
क्यों खास है बस्तर दशहरा? रावण दहन नहीं, मां दंतेश्वरी की आराधना
बस्तर दशहरे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां परंपरागत दशहरे की तरह रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता। इस उत्सव का मुख्य केंद्र भगवान राम की विजय का मंचन नहीं, बल्कि स्थानीय आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की पूजा और बस्तर की विशिष्ट जनजातीय परंपराएं हैं।
मां दंतेश्वरी को बस्तर क्षेत्र की प्रमुख आराध्य देवी माना जाता है। दशहरे के दौरान देवी की आराधना और उनसे जुड़ी परंपराओं का विशेष महत्व रहता है।
यहां मनाया जाने वाला दशहरा इस बात का उदाहरण है कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में त्योहारों के स्वरूप स्थानीय इतिहास, मान्यताओं और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
15वीं शताब्दी से जुड़ा है ऐतिहासिक महत्व
बस्तर दशहरे की परंपरा का इतिहास कई सदियों पुराना माना जाता है। प्रचलित ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, इस उत्सव की शुरुआत 15वीं शताब्दी में बस्तर के काकतीय शासक महाराजा पुरुषोत्तम देव के शासनकाल से जोड़ी जाती है।
समय के साथ यह पर्व बस्तर की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बन गया। इसकी परंपराओं में स्थानीय समुदायों की भागीदारी महत्वपूर्ण रहती है और उत्सव की कई रस्में पीढ़ियों से चली आ रही हैं।
बस्तर दशहरे की यही विशिष्टता इसे देश के दूसरे दशहरा आयोजनों से अलग पहचान देती है।
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को मिलेगी नई पहचान
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को आमंत्रण और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को निमंत्रण दिए जाने की पहल से बस्तर दशहरे को व्यापक स्तर पर प्रस्तुत करने का अवसर मिल सकता है।
ऐसे आयोजन जनजातीय संस्कृति, लोक परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण के साथ-साथ पर्यटन को भी बढ़ावा दे सकते हैं। बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाने से स्थानीय हस्तशिल्प, खानपान और पर्यटन से जुड़े लोगों को भी अवसर मिलने की संभावना रहती है।
