Anmol Sandesh News Desk, इंदौर/महू
मालवा की मिट्टी से निकली लोकधुनों और संत कबीर की वाणी को देश-दुनिया तक पहुंचाने वाले पद्मश्री भैरूसिंह चौहान को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2024-25 से सम्मानित किया। राष्ट्रपति ने उन्हें प्रशस्ति-पत्र और सम्मान प्रदान किया।यह सम्मान मिलने के बाद पूरे मालवा अंचल में गौरव और उत्साह का माहौल है। भैरूसिंह चौहान ने दशकों से अपनी गायकी के जरिए मालवी लोक परंपरा और निर्गुण भक्ति संगीत को जीवंत बनाए रखा है।
पिता से मिली कबीर गायन की विरासत
इंदौर जिले की महू तहसील के बजरंगपुरा गांव से आने वाले भैरूसिंह चौहान को संगीत की विरासत अपने पिता मादू चौहान से मिली। उनके पिता कबीर गायन करते थे और इसी पारंपरिक माहौल में भैरूसिंह ने भी संगीत की दुनिया में कदम रखा।उन्होंने महज 9 साल की उम्र से पारंपरिक मालवी लोक शैली में भजन गाना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे उनकी पहचान मालवा के प्रमुख निर्गुण गायकों में बनने लगी।
कबीर से लेकर मीरा और दादू तक की वाणी
भैरूसिंह चौहान की गायकी की खासियत उनकी निर्गुण भक्ति परंपरा है। उन्होंने अपने भजनों के जरिए संत कबीर, गोरखनाथ, ब्रह्मानंद, मीराबाई और दादू जैसे संतों की वाणी को लोगों तक पहुंचाया।उनकी आवाज में मालवी लोकधुन और संत परंपरा का अनूठा मेल देखने को मिलता है, जिसने उन्हें देशभर में अलग पहचान दिलाई।
50 साल की साधना, 6000 से ज्यादा कार्यक्रम
भैरूसिंह चौहान करीब 5 दशकों से लोक संगीत और भजन परंपरा को समर्पित हैं। इस दौरान उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर 6000 से ज्यादा कार्यक्रम किए हैं।उनकी प्रस्तुतियों ने न सिर्फ निर्गुण भक्ति संगीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाया, बल्कि मालवा की लोक संस्कृति और मौखिक परंपरा को भी देश-विदेश में पहचान दिलाई।
राष्ट्रपति के हाथों सम्मान, मालवा का बढ़ा गौरव
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और संगीत नाटक अकादमी की ओर से आयोजित सम्मान समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किया।भैरूसिंह चौहान के लिए यह सम्मान सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि मालवा की लोक संस्कृति, कबीर परंपरा और भारतीय लोक संगीत की समृद्ध विरासत का सम्मान भी माना जा रहा है।
