Anmol Sandesh News Desk, बलरामपुर
बलरामपुर जिला शिक्षा अधिकारी मनीराम यादव एक बार फिर वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों को लेकर विवादों में हैं। शिक्षा विभाग में पूर्व में करीब 2.42 करोड़ रुपए की कथित वित्तीय गड़बड़ी और अलग-अलग जिलों में चार बार निलंबन का सामना कर चुके यादव के कार्यकाल में अब वित्तीय वर्ष 2025-26 की करीब 4.51 करोड़ रुपए की खरीदी जांच के घेरे में है। कलेक्टर के निर्देश पर कराई गई जांच में खरीदी प्रक्रिया, भुगतान, स्टॉक संधारण और भौतिक सत्यापन को लेकर कई गंभीर सवाल सामने आने की बात कही गई है। हालांकि, फिलहाल इस मामले में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं हुई है और प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की प्रक्रिया जारी है।
4.57 करोड़ मिले, करीब 4.51 करोड़ रुपए खर्च
जांच रिपोर्ट के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025-26 में शिक्षा विभाग को विभिन्न छह योजनाओं के लिए लगभग 4.57 करोड़ रुपए का बजट प्राप्त हुआ था। इस राशि से छात्राओं के लिए साइकिल, विज्ञान एवं तकनीकी सामग्री, फर्नीचर, स्वच्छता सामग्री, खेल उपकरण और स्टेशनरी सहित अन्य आवश्यक सामग्री खरीदी जानी थी। जांच में आरोप है कि करोड़ों रुपए की इस खरीदी के दौरान निर्धारित वित्तीय नियमों और प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। करीब 4.51 करोड़ रुपए की राशि खर्च किए जाने के बावजूद कई खरीदी के दस्तावेज, स्टॉक रिकॉर्ड और सामग्री के वास्तविक वितरण को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी।
क्रय समिति का गठन नहीं, सामग्री का सत्यापन भी अधूरा
जांच में सबसे अहम आपत्तियों में से एक जिला स्तरीय क्रय समिति के गठन से जुड़ी बताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक खरीदी शुरू करने से पहले आवश्यक क्रय समिति का गठन नहीं किया गया। इसके अलावा खरीदी गई सामग्री का भौतिक सत्यापन भी नहीं कराया गया। भंडार गृह के स्टॉक रजिस्टर की जांच में कई सामग्रियों की एंट्री नहीं मिलने की बात सामने आई है। ऐसे में जांच टीम के सामने यह सवाल खड़ा हुआ कि खरीदी गई सामग्री वास्तव में विभाग को प्राप्त हुई या नहीं और यदि प्राप्त हुई तो उसे किन-किन स्कूलों में वितरित किया गया।
50 हजार से अधिक की खरीदी पर समिति का प्रावधान
जांच रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ भंडार क्रय नियम, 2002 के नियम 4.12 का भी उल्लेख किया गया है। इसके तहत निर्धारित सीमा से अधिक की वार्षिक खरीदी वाले कार्यालय में क्रय समिति के गठन का प्रावधान है। समिति में लेखा अधिकारी अथवा लेखा प्रभारी को सदस्य बनाए जाने की व्यवस्था भी बताई गई है। जांच अधिकारियों के मुताबिक संबंधित खरीदी में इन प्रावधानों के अनुपालन को लेकर गंभीर कमी सामने आई है। इससे करोड़ों रुपए की खरीदी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हुए हैं।
कैशबुक में कटिंग और ओवरराइटिंग का भी उल्लेख
जांच के दौरान विभागीय कैशबुक में कटिंग और ओवरराइटिंग मिलने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है। इसके अलावा टेंडर प्रक्रिया से बचने के लिए कथित तौर पर 50-50 हजार रुपए के अलग-अलग बिल तैयार किए जाने का भी उल्लेख किया गया है। करीब 42 लाख रुपए की विज्ञान किट की खरीदी भी जांच के दायरे में है। रिपोर्ट के मुताबिक इस सामग्री का न तो पर्याप्त भौतिक सत्यापन मिला और न ही स्टॉक रजिस्टर में आवश्यक प्रविष्टियां पाई गईं।
4025 साइकिलों के 1.62 करोड़ के भुगतान पर सवाल
छात्राओं के लिए खरीदी गई 4025 साइकिलों के भुगतान का मामला भी जांच में महत्वपूर्ण बिंदु बना है। इनके लिए करीब 1.62 करोड़ रुपए का भुगतान किए जाने की बात सामने आई है। जांच रिपोर्ट के अनुसार संबंधित भुगतान के बावजूद आवश्यक स्टॉक एंट्री और चालान उपलब्ध नहीं मिले। इससे यह सत्यापित करने में परेशानी हुई कि साइकिलें किस मात्रा में प्राप्त हुईं और उनका वितरण किन स्कूलों अथवा छात्राओं को किया गया।
स्टेशनरी और बैठकों के खर्च की भी जांच
जांच में स्टेशनरी के नाम पर करीब 11.20 लाख रुपए खर्च किए जाने का उल्लेख है। रिपोर्ट के मुताबिक इस खर्च में कोटेशन और स्टॉक एंट्री से संबंधित कमियां पाई गईं। इसी तरह शिक्षा विभाग की बैठकों में नाश्ते पर करीब 4 लाख रुपए खर्च किए जाने की जानकारी भी जांच रिपोर्ट में सामने आई है। परीक्षा से संबंधित मुद्रण सामग्री के लिए रांची की एक फर्म को करीब 17.96 लाख रुपए का भुगतान किए जाने की भी जांच की गई। जांच के दौरान कुछ ऐसे भुगतानों का भी उल्लेख किया गया है, जिनके संबंध में संबंधित सामग्री कार्यालय अथवा भंडार में उपलब्ध नहीं मिली।
कलेक्टर ने कराई जांच, DEO को शो-कॉज नोटिस
मामले की शिकायत के बाद कलेक्टर चंदन त्रिपाठी के निर्देश पर अपर कलेक्टर प्रमोद गुप्ता और जिला कोषालय अधिकारी दशरथ सोनी से जांच कराई गई। जांच रिपोर्ट में सामने आई आपत्तियों के आधार पर जिला शिक्षा अधिकारी को शो-कॉज नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है। प्रशासन की ओर से प्रारंभिक तौर पर तीन दिन में जवाब मांगा गया था। हालांकि, डीईओ द्वारा जवाब देने के लिए 10 दिन का समय मांगा गया है। कलेक्टर के अनुसार जवाब मिलने और उसके परीक्षण के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। यदि जवाब संतोषजनक नहीं पाया जाता है तो प्रकरण शासन को कार्रवाई के लिए भेजा जाएगा।
अब जवाब पर टिकी अगली कार्रवाई
करोड़ों रुपए की सरकारी राशि से जुड़ी इस जांच ने शिक्षा विभाग में वित्तीय अनुशासन और खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। खासतौर पर स्टॉक एंट्री, सामग्री के भौतिक सत्यापन, क्रय समिति, भुगतान दस्तावेज और बिलिंग प्रक्रिया में बताई गई कमियों को गंभीरता से देखा जा रहा है। फिलहाल जांच रिपोर्ट में सामने आए आरोपों पर संबंधित अधिकारी का पक्ष और अंतिम प्रशासनिक निर्णय सामने आना बाकी है। शो-कॉज के जवाब के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि विभाग इस मामले में किस स्तर की कार्रवाई करता है।
