
भोपाल (अनमोल संदेश डिजिटल).:
मशहूर उर्दू शायर Bashir Badr का गुरुवार दोपहर भोपाल में निधन हो गया। वे 91 वर्ष के थे। लंबे समय से वे डिमेंशिया बीमारी से पीड़ित थे और उनकी याददाश्त काफी कमजोर हो चुकी थी। गुरुवार दोपहर करीब 12 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।
परिजनों के अनुसार, पिछले कुछ समय से उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी। बीमारी के कारण वे लोगों को पहचान भी नहीं पा रहे थे। हालांकि जब भी उन्हें मुशायरों की याद आती थी तो वे “इरशाद… इरशाद…” कहने लगते थे। उनके इस अंदाज को सुनकर चाहने वाले भावुक हो जाते थे।
आज शाम हो सकता है अंतिम संस्कार:
परिवार के मुताबिक, उनका अंतिम संस्कार गुरुवार शाम को किए जाने की संभावना है। हालांकि अंतिम समय को लेकर अभी आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।
उर्दू शायरी को दिया नया अंदाज:
Bashir Badr ने उर्दू गजल को एक नया और आसान लहजा दिया। उन्होंने कठिन और भारी-भरकम शब्दों की जगह आम बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल किया, जिससे उनकी शायरी सीधे लोगों के दिलों तक पहुंची।
उनकी गजलों में मोहब्बत, दर्द, रिश्ते और जिंदगी के अनुभवों की गहरी झलक मिलती थी। उनके कई शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं और मुशायरों की शान माने जाते हैं।
उनका मशहूर शेर—
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
ना जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए…”
आज भी साहित्य प्रेमियों के दिलों में खास जगह रखता है।
शिक्षा और साहित्यिक सफर:
साल 1969 में उन्होंने Aligarh Muslim University से उर्दू साहित्य में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की थी। इसके बाद 12 अगस्त 1974 को उन्होंने Meerut College के उर्दू विभाग में बतौर लेक्चरर जॉइन किया।
वे वर्ष 1990 तक मेरठ कॉलेज में सेवाएं देते रहे। 1974 से 1990 के बीच का समय उनके साहित्यिक जीवन का स्वर्णिम दौर माना जाता है। इसी दौरान उनकी शायरी देश और विदेश में लोकप्रिय हुई और उन्होंने उर्दू अदब की दुनिया में एक खास मुकाम हासिल किया।
साहित्य जगत में शोक की लहर:
Bashir Badr के निधन से साहित्य और उर्दू शायरी जगत में शोक की लहर है। उनके चाहने वाले सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि दे रहे हैं और उनकी मशहूर गजलों को याद कर रहे हैं।
