Friday, October 16, 2026
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धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, तमिलनाडु सरकार का आदेश खारिज

Anmol Sandesh News Desk, नई दिल्ली

Supreme Court Reservation Verdict: धर्म परिवर्तन के बाद पिछड़ा वर्ग आरक्षण का लाभ लेने से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को बरकरार नहीं रहने दिया, जिसके तहत हिंदू धर्म से इस्लाम अपनाने वाले कुछ लोगों को ‘पिछड़ा वर्ग मुस्लिम’ (BC Muslim) श्रेणी में शामिल कर आरक्षण का लाभ देने की व्यवस्था की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज कर दी।

15 अक्टूबर 2026 को आए इस फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल धर्म परिवर्तन कर लेने से किसी व्यक्ति को नई अधिसूचित पिछड़ा वर्ग मुस्लिम जाति या समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता। व्यक्ति का पहले का सामाजिक दर्जा अपने आप नई धार्मिक समुदाय-आधारित आरक्षित श्रेणी में स्थानांतरित नहीं हो जाता।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस शिरीष चंद्रशेखर की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। मामला इस सवाल से जुड़ा था कि क्या हिंदू सामाजिक व्यवस्था में पिछड़े वर्ग, अति पिछड़े वर्ग, विमुक्त समुदाय या अनुसूचित जाति से आने वाला व्यक्ति इस्लाम अपनाने के बाद केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी का लाभ ले सकता है।

अदालत के फैसले के अनुसार, पहले की जाति या सामाजिक श्रेणी का दर्जा अपने आप किसी दूसरी अधिसूचित मुस्लिम समुदाय की सदस्यता का प्रमाण नहीं बनता। आरक्षण के लिए संबंधित समुदाय की कानूनी पात्रता और लागू नियमों का पालन जरूरी

तमिलनाडु सरकार के आदेश में क्या था?

तमिलनाडु सरकार ने 9 मार्च 2024 को सरकारी आदेश जारी किया था। इसके तहत पिछड़ा वर्ग (BC), अति पिछड़ा वर्ग (MBC), विमुक्त समुदाय (DNC) और अनुसूचित जाति (SC) से आने वाले कुछ लोगों को इस्लाम अपनाने के बाद ‘पिछड़ा वर्ग मुस्लिम’ यानी BC(Muslim) श्रेणी में प्रमाणपत्र देने की व्यवस्था की गई थी।

सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया था कि जो लोग पहले से सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों से आते हैं, उन्हें धर्म परिवर्तन के कारण आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं होना चाहिए। इस व्यवस्था के तहत संबंधित लोगों को अधिसूचित मुस्लिम समुदायों में प्रमाणपत्र देने का प्रावधान किया गया था।

हालांकि, मद्रास हाईकोर्ट ने 25 जून 2026 को इस सरकारी आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा है।

किस मामले से जुड़ा था पूरा विवाद?

यह मामला समीर अहमद की याचिका से जुड़ा था। उन्होंने इस्लाम अपनाने के बाद ‘मुस्लिम लेब्बाई’ समुदाय का प्रमाणपत्र मांगा था, लेकिन संबंधित अधिकारी ने उनका आवेदन स्वीकार नहीं किया। इसके बाद मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा।

हाईकोर्ट ने कहा था कि धर्म परिवर्तन मात्र से किसी व्यक्ति को किसी विशेष अधिसूचित मुस्लिम समुदाय का सदस्य घोषित नहीं किया जा सकता। इसी फैसले को तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की अपील खारिज करते हुए हाईकोर्ट के निर्णय को कायम रखा।

क्या धर्म बदलने पर हर तरह का आरक्षण खत्म हो जाएगा?

इस फैसले को समझते समय एक महत्वपूर्ण अंतर ध्यान में रखना जरूरी है। यह मामला विशेष रूप से तमिलनाडु में धर्म परिवर्तन के बाद BC(Muslim) श्रेणी में शामिल किए जाने और प्रमाणपत्र जारी करने से जुड़ा था। इसे हर धर्म परिवर्तन और देश की सभी आरक्षण श्रेणियों पर लागू होने वाला एक समान नियम मानना सही नहीं होगा। पात्रता संबंधित कानूनों, अधिसूचित समुदायों और लागू संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार तय होती है।

फैसले के बाद क्यों बढ़ी चर्चा?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने धर्म परिवर्तन, सामाजिक पहचान और आरक्षण की कानूनी पात्रता से जुड़े सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है। अदालत ने तमिलनाडु सरकार के 2024 के आदेश को लागू करने की अनुमति नहीं दी और मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अब इस फैसले के बाद आरक्षण संबंधी प्रमाणपत्रों और पात्रता के मामलों में संबंधित कानूनी प्रावधानों की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी।

 

Kanchan Sharma
Kanchan Sharma
कंचन शर्मा वर्तमान में दैनिक समाचार पत्र "अनमोल संदेश" में कार्यरत। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया,प्रिंट, न्यूज एजेंसी और डिजिटल पत्रकारिता में उनका लंबा अनुभव है, जिसमें उन्होंने रिपोर्टर और डेस्क पर विभिन्न भूमिकाओं में काम किया है।
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