Anmol Sandesh News Desk
कभी गांवों की गर्मी और बारिश की रातों में अपनी टिमटिमाती रोशनी से वातावरण को मोहक बनाने वाले जुगनू अब तेजी से गायब होते जा रहे हैं। वैज्ञानिक इसे पर्यावरणीय असंतुलन और प्राकृतिक आवासों के बिगड़ते हालात का गंभीर संकेत मान रहे हैं। भारत में पहली बार जुगनुओं (फायरफ्लाई) पर किए गए राष्ट्रीय स्तर के अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि जहां पर्यावरणीय क्षरण बढ़ता है, वहां जुगनुओं की संख्या तेजी से घटने लगती है।इसी कारण वैज्ञानिक जुगनुओं को “इंडिकेटर ऑफ एनवायरनमेंटल हेल्थ” यानी पर्यावरणीय स्वास्थ्य का सूचक मानते हैं। उल्लेखनीय है कि दो वर्ष पूर्व गांधीसागर अभयारण्य क्षेत्र में भी जुगनुओं के अध्ययन के लिए विशेषज्ञों का दौरा हुआ था।
92 प्रजातियों की पहली राष्ट्रीय सूची तैयार
कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर अम्लान दास के मार्गदर्शन में पीएचडी शोधार्थी परवेश खान ने भारत में जुगनुओं की पहली व्यापक राष्ट्रीय सूची तैयार की है। अध्ययन के अनुसार देश में जुगनुओं की कुल 92 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से लगभग 61 प्रतिशत प्रजातियां केवल भारत में ही मिलती हैं।यह शोध वर्ष 1881 से अक्टूबर 2025 तक उपलब्ध वैज्ञानिक आंकड़ों और शोध अध्ययनों के विश्लेषण पर आधारित है। अध्ययन में 22 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में जुगनुओं की उपस्थिति दर्ज की गई है।

पश्चिमी घाट बना जुगनुओं का सबसे बड़ा आश्रय
शोध के अनुसार देश का पश्चिमी घाट क्षेत्र जुगनुओं की जैव विविधता का सबसे समृद्ध क्षेत्र है। यहां देश की लगभग 25 प्रतिशत जुगनू प्रजातियां पाई जाती हैं। गोवा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और गुजरात के पश्चिमी घाट क्षेत्रों में इनकी सबसे अधिक मौजूदगी दर्ज की गई है। वहीं रेगिस्तानी और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में इनकी संख्या बेहद कम पाई गई।
कृत्रिम रोशनी और कीटनाशक बन रहे सबसे बड़ा खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक कृत्रिम रोशनी, बढ़ता प्रकाश प्रदूषण, रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग और प्राकृतिक आवासों का लगातार विनाश जुगनुओं के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है।वैज्ञानिकों ने इनके संरक्षण के लिए फायरफ्लाई हेरिटेज साइट, फायरफ्लाई सेंचुरी और बायोपार्क विकसित करने की सिफारिश की है। इसके अलावा वनों और संवेदनशील क्षेत्रों में सेंसर आधारित प्रकाश व्यवस्था अपनाने का सुझाव भी दिया गया है।

इसलिए कहलाते हैं पर्यावरण के प्रहरी
शोधकर्ता परवेश खान के अनुसार जुगनू पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। किसी क्षेत्र में उनकी संख्या में कमी पर्यावरणीय गिरावट का स्पष्ट संकेत मानी जाती है।इसका उदाहरण कर्नाटक के पश्चिमी घाट क्षेत्र में तीन वर्षों तक किए गए सर्वेक्षण में देखने को मिला। पहले दो वर्षों तक जुगनुओं की संख्या सामान्य रही, लेकिन तीसरे वर्ष उनकी आबादी में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। बाद में जांच में सामने आया कि कॉफी बागानों के आसपास बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हुई थी, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हुआ और जुगनुओं की संख्या कम हो गई।
भारत में जुगनुओं के चार प्रमुख समूह
अध्ययन के अनुसार भारत में जुगनुओं के चार प्रमुख उप-परिवार पाए जाते हैं- ल्यूसीओलिने, ओटोट्रेटिने, लैम्पायरीने और साइफोनोसेरिने। इनमें ल्यूसीओलिने सबसे अधिक विविधता वाला समूह है, जिसमें 37 प्रजातियां दर्ज की गई हैं, जबकि ओटोट्रेटिने में 31 प्रजातियां पाई गई हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते संरक्षण के प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां जुगनुओं की प्राकृतिक चमक को केवल किताबों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी।
