Anmol Sandesh News Desk,इस्लामाबाद
सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक ने भारत को लेकर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि पाकिस्तान के हिस्से का पानी रोकने की कोशिश की गई तो इसे गंभीर मामला माना जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत पाकिस्तान के हिस्से के पानी के प्रवाह को सीमित करना चाहता है।संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने कहा कि सिंधु जल संधि कानूनी रूप से अब भी लागू है और भारत इसे एकतरफा न तो समाप्त कर सकता है, न स्थगित कर सकता है और न ही इसमें बदलाव कर सकता है।
पाकिस्तान करेगा अंतरराष्ट्रीय सेमिनार
पाकिस्तानी सरकार ने घोषणा की है कि इस्लामाबाद में सिंधु जल संधि पर एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया जाएगा। इसमें कानूनी विशेषज्ञ, जल विशेषज्ञ और विदेशी प्रतिनिधि भाग लेंगे। सेमिनार में संधि के कानूनी और तकनीकी पहलुओं पर चर्चा की जाएगी।
पहले भी दे चुके हैं चेतावनी
इससे पहले 21 जून को पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी कहा था कि यदि पाकिस्तान की जल सुरक्षा खतरे में पड़ी तो वह भारत के खिलाफ कड़ा कदम उठा सकता है। उन्होंने भारत पर सिंधु नदी प्रणाली के जल प्रवाह में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया था।

भारत ने क्यों निलंबित की थी संधि?
भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद, जिसमें 26 लोगों की मौत हुई थी, सिंधु जल संधि को निलंबित करने की घोषणा की थी। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि को बहाल नहीं किया जाएगा।
क्या है सिंधु जल संधि?
1960 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान के बीच, विश्व बैंक की मध्यस्थता में सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुए थे।इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों—सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज—के जल बंटवारे का प्रावधान किया गया। यह समझौता दुनिया के सबसे लंबे समय तक लागू रहने वाले अंतरराष्ट्रीय जल समझौतों में से एक माना जाता है।

पाकिस्तान पर क्या पड़ सकता है असर?
पाकिस्तान की लगभग 90 प्रतिशत सिंचित कृषि भूमि सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। देश की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का लगभग 23 प्रतिशत योगदान है और करोड़ों लोगों की आजीविका इसी पर टिकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल उपलब्धता प्रभावित होती है तो खेती, बिजली उत्पादन, उद्योग और रोजगार पर व्यापक असर पड़ सकता है।फिलहाल दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर बयानबाज़ी जारी है। भविष्य में क्या कदम उठाए जाएंगे, यह दोनों सरकारों के आधिकारिक निर्णय और कूटनीतिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगा।
