Anmol Sandesh News Desk,पुरी (ओडिशा)
विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा सिर्फ भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की भव्य यात्रा के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अनोखी धार्मिक परंपराओं के लिए भी पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इन्हीं परंपराओं में से एक है ‘अधर पना’ की रस्म, जिसे रथयात्रा के सबसे रहस्यमयी और महत्वपूर्ण अनुष्ठानों में गिना जाता है।इस परंपरा में भगवान को अर्पित किए गए प्रसाद के मिट्टी के बड़े-बड़े घड़ों को जानबूझकर तोड़ दिया जाता है। सबसे हैरानी की बात यह है कि इस भोग को न तो श्रद्धालु ग्रहण करते हैं और न ही मंदिर के पुजारी।
क्या है ‘अधर पना‘ की परंपरा?
‘अधर पना’ रथयात्रा के दौरान आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी के दिन किया जाने वाला एक विशेष अनुष्ठान है। इस दिन मिट्टी के विशाल घड़ों में एक विशेष पेय तैयार किया जाता है। इसे दूध, पनीर, चीनी, केला, तुलसी, दालचीनी, जायफल और कई सुगंधित सामग्री मिलाकर बनाया जाता है।इसके बाद इन घड़ों को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के तीनों रथों पर इस प्रकार रखा जाता है कि उनकी ऊंचाई भगवान के अधरों (होंठों) के पास रहे। पूजा-अर्चना के बाद इन घड़ों को वहीं फोड़ दिया जाता है, जिससे पूरा पेय रथ के चारों ओर बह जाता है।
आखिर क्यों फोड़े जाते हैं ये घड़े?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रथयात्रा में केवल श्रद्धालु ही नहीं बल्कि सूक्ष्म, अदृश्य और दिव्य शक्तियां भी भगवान के दर्शन के लिए उपस्थित होती हैं। ‘अधर पना’ का यह विशेष भोग उन्हीं शक्तियों को समर्पित माना जाता है।मान्यता है कि घड़ा फूटने के बाद जो प्रसाद चारों ओर फैलता है, उसे वही अदृश्य शक्तियां स्वीकार करती हैं। इसलिए इस प्रसाद को किसी मनुष्य द्वारा ग्रहण नहीं किया जाता।
इंसान इस प्रसाद को क्यों नहीं खा सकते?
शास्त्रों और परंपराओं के अनुसार, ‘अधर पना’ का भोग मनुष्यों के लिए नहीं होता। इसे उन सूक्ष्म जीवों, आत्माओं और पारलौकिक शक्तियों को अर्पित किया जाता है, जो भगवान की रथयात्रा में शामिल होती हैं।इसी कारण न तो भक्त और न ही मंदिर के सेवायत या पुजारी इस प्रसाद का सेवन करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस भोग को ग्रहण करना अदृश्य शक्तियों के अधिकार में हस्तक्षेप माना जाता है।
सदियों से चली आ रही है परंपरा
पुरी की जगन्नाथ रथयात्रा में ‘अधर पना’ की यह परंपरा सदियों से निभाई जा रही है। श्रद्धालु इसे भगवान जगन्नाथ की दिव्य लीला और सनातन परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। यही कारण है कि हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस अनोखे अनुष्ठान को देखने के लिए पुरी पहुंचते हैं।
