Anmol Sandesh News Desk,काठमांडू
नेपाल की राजनीति और न्यायपालिका के बीच टकराव गहराता नजर आ रहा है। प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार पर देश के सुप्रीम कोर्ट को प्रभावित करने और न्यायपालिका की स्वतंत्रता कमजोर करने के गंभीर आरोप लगे हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) और इंटरनेशनल कमीशन ऑफ ज्यूरिस्ट्स (ICJ) ने संयुक्त बयान जारी कर सरकार की कार्यप्रणाली पर चिंता जताई है।

क्या हैं आरोप?
मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों पर इस्तीफा देने का दबाव बना रही है। यदि वे इस्तीफा नहीं देते, तो उनके खिलाफ महाभियोग (Impeachment) लाने की तैयारी की जा सकती है। संगठनों का कहना है कि इसका उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट की संरचना बदलना और संवैधानिक मामलों के फैसलों को प्रभावित करना हो सकता है।
मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति पर विवाद
विवाद की शुरुआत मनोज कुमार शर्मा को नेपाल का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किए जाने से हुई। वे वरिष्ठता क्रम में चौथे स्थान पर थे, जबकि उनसे वरिष्ठ जस्टिस सपना प्रधान मल्ला, कुमार रेग्मी और हरि फुयाल को नजरअंदाज कर दिया गया।नेपाल में पिछले करीब 70 वर्षों से सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश बनाने की परंपरा रही है, लेकिन इस बार सरकार ने यह परंपरा तोड़ दी। हालांकि संविधान में वरिष्ठता को अनिवार्य नहीं बताया गया है।
16 शिकायतों पर भी उठे सवाल
मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि मनोज कुमार शर्मा के खिलाफ 16 शिकायतें संसदीय समिति को मिली थीं, लेकिन इन शिकायतों की न तो सार्वजनिक जांच हुई और न ही इन्हें मीडिया के सामने रखा गया। इससे नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सरकार का पक्ष
प्रधानमंत्री बालेन शाह पहले ही कह चुके हैं कि “सिर्फ वरिष्ठता नहीं, बल्कि योग्यता के आधार पर नियुक्तियां होनी चाहिए।” सरकार का कहना है कि संविधान में सबसे वरिष्ठ जज को ही मुख्य न्यायाधीश बनाने का कोई प्रावधान नहीं है।

महाभियोग की आशंका क्यों गंभीर?
नेपाल के संविधान के अनुसार, किसी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होते ही उसे तुरंत निलंबित किया जा सकता है। यदि तीनों वरिष्ठ न्यायाधीश एक साथ निलंबित होते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली और कई महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों की सुनवाई प्रभावित हो सकती है।
संवैधानिक परिषद में बदलाव पर भी विवाद
मई 2026 में सरकार ने अध्यादेश के जरिए संवैधानिक परिषद के नियमों में बदलाव किया। पहले नियुक्तियों के लिए व्यापक सहमति और अधिक सदस्यों की उपस्थिति जरूरी थी, लेकिन नए नियमों के तहत कम सदस्यों की मौजूदगी और साधारण बहुमत से भी फैसले लिए जा सकते हैं। विपक्ष और मानवाधिकार संगठन इसे संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता के लिए खतरा बता रहे हैं।
क्यों अहम है यह मामला?
नेपाल में यह विवाद केवल मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी बड़े सवाल खड़े कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने सरकार से न्यायपालिका की स्वायत्तता का सम्मान करने और सभी नियुक्तियों में पारदर्शिता बनाए रखने की अपील की है।
