Monday, August 3, 2026
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अब ‘नौरू’ नहीं, ‘रिपब्लिक ऑफ नाओएरो’! दुनिया के तीसरे सबसे छोटे देश ने बदला अपना नाम, जानिए क्यों लिया ऐतिहासिक फैसला

Anmol Sandesh News Desk, यारेन (प्रशांत महासागर)

प्रशांत महासागर में स्थित दुनिया के तीसरे सबसे छोटे द्वीपीय देश नौरू ने अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को पुनर्स्थापित करते हुए बड़ा फैसला लिया है। अब यह देश आधिकारिक तौर पर रिपब्लिक ऑफ नाओएरो (Republic of Naoero)” कहलाएगा। संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भी अपने आधिकारिक रिकॉर्ड में इस नए नाम को शामिल कर लिया है।करीब 12 हजार की आबादी वाले इस देश का कहना है कि नाओएरो” उसका मूल और पारंपरिक नाम है, जबकि नौरू” विदेशी उच्चारण और सुविधा के कारण प्रचलन में आया था। सरकार का मानना है कि अब समय आ गया है कि दुनिया उसे उसकी वास्तविक सांस्कृतिक पहचान से जाने।

21वीं सदी का आठवां देश जिसने बदला अपना नाम

नाओएरो 21वीं सदी में अपना आधिकारिक नाम बदलने वाला आठवां देश बन गया है। इससे पहले कई देशों ने अपनी ऐतिहासिक और स्थानीय पहचान को मजबूत करने के लिए नाम बदले थे।

हाल के प्रमुख उदाहरण:

  • 2022: तुर्की → तुर्किये (Türkiye)
  • 2018: स्वाजीलैंड → इस्वातिनी (Eswatini)
  • 2026: नौरू → रिपब्लिक ऑफ नाओएरो (Naoero)

एक शादी से शुरू हुआ 10 साल का खूनी गृहयुद्ध

19वीं सदी के अंत तक यह छोटा-सा द्वीप 12 स्थानीय जनजातियों का घर था। वर्ष 1878 में एक शादी समारोह के दौरान विवाद इतना बढ़ा कि गोली चल गई और एक कबीलाई प्रमुख के बेटे की मौत हो गई।पारंपरिक बदले की प्रथा ने इस घटना को पूरे द्वीप में फैलते गृहयुद्ध का रूप दे दिया। यह संघर्ष करीब 10 वर्षों तक चला और इतिहास में नाओएरो सिविल वॉर” के नाम से दर्ज हुआ।स्थिति इतनी भयावह हो गई कि 1888 में जर्मनी ने हस्तक्षेप कर द्वीप पर नियंत्रण स्थापित किया, हथियार जब्त किए और गृहयुद्ध समाप्त कराया।

जर्मनी से ऑस्ट्रेलिया और फिर आजादी तक का सफर

  • 1888: जर्मनी का नियंत्रण
  • 1914: प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ऑस्ट्रेलिया ने कब्जा किया
  • 31 जनवरी 1968: नाओएरो को पूर्ण स्वतंत्रता मिली और यह एक संप्रभु गणराज्य बना।

फॉस्फेट ने बनाया दुनिया के सबसे अमीर देशों में शामिल

1900 में यहां विशाल फॉस्फेट भंडार मिलने के बाद देश की किस्मत बदल गई।1970 के दशक तक नाओएरो की प्रति व्यक्ति आय दुनिया के विकसित देशों के बराबर पहुंच गई। शिक्षा, स्वास्थ्य और कई सरकारी सुविधाएं लगभग मुफ्त थीं। सरकार ने विदेशों में होटल, इमारतें और कई बड़ी संपत्तियों में निवेश भी किया।

जिस खनिज ने अमीर बनाया, उसी ने आर्थिक संकट में धकेला

लगातार खनन के कारण फॉस्फेट के भंडार तेजी से समाप्त होने लगे।1990 के दशक तक देश गंभीर आर्थिक संकट में फंस गया। विदेशी निवेश भी घाटे में चले गए और कभी दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में गिना जाने वाला नाओएरो आर्थिक चुनौतियों से जूझने लगा।

अब सबसे बड़ा खतराजलवायु परिवर्तन

आज नाओएरो के सामने सबसे बड़ी चुनौती समुद्र का बढ़ता जलस्तर है।

  • 1993 के बाद से समुद्र का स्तर हर वर्ष औसतन 5 मिलीमीटर बढ़ रहा है।
  • सदी के अंत तक समुद्र का स्तर 20 से 57 सेंटीमीटर तक बढ़ने की आशंका है।
  • फॉस्फेट खनन के कारण द्वीप का करीब 80% अंदरूनी हिस्सा बंजर हो चुका है।
  • अधिकांश आबादी समुद्र तट के आसपास रहने को मजबूर है, जहां कटाव और बाढ़ का खतरा लगातार बढ़ रहा है।

विदेशियों को नागरिकता देकर जुटाएगा फंड

जलवायु संकट से निपटने के लिए सरकार ने निवेश के बदले नागरिकता (Citizenship by Investment) देने की योजना शुरू की है।

इससे मिलने वाले धन का उपयोग—

  • सुरक्षित ऊंचे इलाकों में पुनर्वास,
  • तटीय सुरक्षा,
  • जलवायु परिवर्तन से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर,
  • और भविष्य की आपदा प्रबंधन योजनाओं पर किया जाएगा।

सांस्कृतिक पहचान को मिली नई पहचान

नाओएरो का कहना है कि किसी भी देश की असली पहचान केवल उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी भाषा, संस्कृति, इतिहास और परंपराओं से होती है। इसी सोच के साथ उसने अपनी मूल पहचान को आधिकारिक रूप से दुनिया के सामने स्थापित करने का फैसला लिया है।यह कदम केवल नाम बदलने का नहीं, बल्कि अपनी ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक अस्मिता को वैश्विक स्तर पर सम्मान दिलाने का प्रयास माना जा रहा है।

 

Kanchan Sharma
Kanchan Sharma
कंचन शर्मा वर्तमान में दैनिक समाचार पत्र "अनमोल संदेश" में कार्यरत। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया,प्रिंट, न्यूज एजेंसी और डिजिटल पत्रकारिता में उनका लंबा अनुभव है, जिसमें उन्होंने रिपोर्टर और डेस्क पर विभिन्न भूमिकाओं में काम किया है।
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