Anmol Sandesh News Desk, मुरैना/दिमनी
किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए बेहतर सुविधा देने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये की लागत से बनाई गई सिहोंनिया गांव की गल्ला मंडी अब बदहाली और कथित अतिक्रमण की तस्वीर बन गई है। दावा है कि मंडी का निर्माण करीब चार साल पहले पूरा हुआ था, लेकिन हैरानी की बात यह है कि निर्माण के बाद से यहां एक दिन भी किसानों की फसल की खरीद-बिक्री नहीं हो सकी।जिस मंडी से किसानों को स्थानीय स्तर पर अपनी उपज बेचने की सुविधा मिलने की उम्मीद थी, वहां अब कथित तौर पर पशु बांधे जा रहे हैं और कृषि उपकरण रखे जा रहे हैं।
किसानों के लिए करोड़ों खर्च कर बनाई गई थी मंडी
दिमनी विधानसभा क्षेत्र के सिहोंनिया गांव में इस गल्ला मंडी का निर्माण किसानों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए कराया गया था।उम्मीद थी कि मंडी शुरू होने के बाद आसपास के गांवों के किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए दूर-दराज की मंडियों का रुख नहीं करना पड़ेगा।स्थानीय किसानों को बेहतर बाजार, खरीद-बिक्री की सुविधा और अपनी फसल का उचित मूल्य पाने के लिए एक व्यवस्थित स्थान मिल सकेगा।बताया जाता है कि मंडी का शुभारंभ विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के कर कमलों से किया गया था।लेकिन उद्घाटन के बाद जिस मंडी से किसानों को फायदा मिलना था, वह कथित तौर पर आज भी अपने मूल उद्देश्य से दूर है।
मंडी बनी पशुओं का ठिकाना?
मंडी परिसर की मौजूदा स्थिति पर सवाल खड़े हो रहे हैं।स्थानीय लोगों के मुताबिक, मंडी का इस्तेमाल किसानों की फसल की खरीद-बिक्री के बजाय दूसरे कामों में किया जा रहा है।
कथित तौर पर—
* मंडी परिसर में पशु बांधे जा रहे हैं
* कृषि उपकरण और अन्य सामान रखे जा रहे हैं
* परिसर के कई हिस्से खाली पड़े हैं
* जगह-जगह गंदगी के ढेर दिखाई देते हैं
* मंडी की मूल सुविधाओं का इस्तेमाल नहीं हो रहा
अगर स्थानीय लोगों के ये आरोप सही हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि किसानों के लिए बनाई गई करोड़ों की संपत्ति की देखरेख कौन कर रहा है?
किसानों को चार साल में नहीं मिला फायदा
सबसे बड़ा सवाल मंडी की उपयोगिता को लेकर है। ग्रामीणों और किसानों का कहना है कि सरकार ने किसानों को सुविधा देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए, लेकिन चार साल बीतने के बावजूद उन्हें इसका वास्तविक लाभ नहीं मिला।किसानों को आज भी अपनी फसल बेचने के लिए दूसरी जगहों का सहारा लेना पड़ता है।ऐसे में किसान पूछ रहे हैं—जब मंडी बनकर तैयार हो चुकी है तो इसे शुरू क्यों नहीं किया जा रहा? मंडी में नियमित फसल खरीदी कब शुरू होगी? अगर परिसर पर अतिक्रमण है तो उसे हटाने की कार्रवाई कब होगी?
करोड़ों की संपत्ति, लेकिन उपयोग शून्य?
सरकारी योजनाओं का उद्देश्य तभी पूरा होता है जब उनका लाभ आम जनता तक पहुंचे। सिहोंनिया की इस मंडी को लेकर सामने आई तस्वीर यही सवाल खड़ा करती है कि निर्माण के बाद यदि चार साल तक किसानों की फसल की खरीद ही नहीं हुई, तो करोड़ों रुपये खर्च करने का उद्देश्य कैसे पूरा हुआ? मंडी के निष्क्रिय रहने से सिर्फ सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल पर सवाल नहीं उठता, बल्कि आसपास के किसानों को मिलने वाली संभावित बाजार सुविधा भी प्रभावित होती है।
गंदगी और अतिक्रमण पर भी सवाल
मंडी परिसर में कथित तौर पर जगह-जगह गंदगी जमा है।स्थानीय लोगों का आरोप है कि लंबे समय से मंडी के इस्तेमाल और रखरखाव पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। खाली परिसर में कथित अतिक्रमण बढ़ता गया और अब स्थिति ऐसी बन गई है कि मंडी किसानों की फसल के बजाय दूसरे कामों के लिए इस्तेमाल होती दिखाई दे रही है।अगर ऐसा है तो जिम्मेदार विभागों की निगरानी और कार्रवाई पर भी सवाल उठना लाजिमी है।
अब किसानों की मांग—मंडी को तुरंत शुरू किया जाए
ग्रामीणों और किसानों की मांग है कि प्रशासन पूरे मामले की जांच करे और मंडी को जल्द से जल्द उसके मूल उद्देश्य के लिए शुरू कराया जाए।किसानों का कहना है कि— मंडी से अतिक्रमण हटाया जाए, परिसर की साफ-सफाई कराई जाए, जरूरी व्यवस्थाएं दुरुस्त की जाएं और नियमित रूप से किसानों की फसल की खरीद-बिक्री शुरू की जाए।इससे क्षेत्र के किसानों को स्थानीय स्तर पर बाजार सुविधा मिल सकेगी और उन्हें अपनी उपज बेचने के लिए अनावश्यक दूरी तय नहीं करनी पड़ेगी।
अब सबसे बड़ा सवाल
करोड़ों रुपये खर्च करके बनाई गई गल्ला मंडी अगर चार साल से किसानों के काम ही नहीं आ रही, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? क्या प्रशासन मंडी की मौजूदा स्थिति की जांच करेगा? क्या कथित अतिक्रमण हटाया जाएगा?
और सबसे अहम—
किसानों की यह मंडी आखिर कब किसानों के काम आएगी?
सिहोंनिया की गल्ला मंडी की कहानी सरकारी निर्माण और उसके इस्तेमाल के बीच पैदा हुए उस अंतर पर बड़ा सवाल खड़ा करती है, जिसका जवाब अब स्थानीय किसान और ग्रामीण प्रशासन से मांग रहे हैं।
