Anmol Sandesh News Desk, वॉशिंगटन/नई दिल्ली
अमेरिका ने ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाते हुए उसके अंतरराष्ट्रीय कारोबार से जुड़े 5 महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर नए प्रतिबंध लगाए हैं। इनका मकसद ईरान की कमाई के उन रास्तों को सीमित करना है, जिनके जरिए वह दूसरे देशों के साथ आर्थिक गतिविधियां करता है।अमेरिकी कार्रवाई में डिजिटल एसेट्स/क्रिप्टोकरेंसी, टेक्नोलॉजी, सोना, एविएशन और शिपिंग जैसे सेक्टर शामिल हैं। अमेरिका का संदेश साफ है—अगर कोई विदेशी कंपनी या देश प्रतिबंधित गतिविधियों के जरिए ईरान को आर्थिक लाभ पहुंचाता है, तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है।
ईरान की कमाई के 5 रास्तों पर अमेरिकी वार
अमेरिकी प्रतिबंधों का फोकस उन क्षेत्रों पर है, जिनका इस्तेमाल ईरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार और वित्तीय गतिविधियों के लिए कर सकता है।
1. डिजिटल एसेट्स और क्रिप्टो
डिजिटल एसेट्स और क्रिप्टोकरेंसी को लेकर अमेरिका की चिंता यह है कि इनका इस्तेमाल पारंपरिक बैंकिंग सिस्टम के बाहर पैसे के लेन-देन के लिए किया जा सकता है।प्रतिबंधों का उद्देश्य ईरान से जुड़ी ऐसी वित्तीय गतिविधियों को सीमित करना है, जिनसे उसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पैसा जुटाना या ट्रांसफर करना आसान हो।
2. टेक्नोलॉजी सेक्टर
टेक्नोलॉजी भी अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में है। अमेरिका ईरान तक ऐसी तकनीक और उपकरणों की पहुंच सीमित करना चाहता है, जिनका इस्तेमाल उसकी औद्योगिक, आर्थिक या रणनीतिक क्षमताओं को मजबूत करने में हो सकता है।
3. सोने का कारोबार
सोना लंबे समय से प्रतिबंधों से प्रभावित देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेन-देन में वैकल्पिक रास्ते के तौर पर महत्वपूर्ण रहा है।अमेरिका ईरान से जुड़े सोने के कारोबार और उससे होने वाले आर्थिक लाभ पर भी शिकंजा कसना चाहता है।
4. एविएशन सेक्टर
ईरान के एविएशन सेक्टर से जुड़े कारोबार और सेवाओं पर भी अमेरिकी दबाव बढ़ाया गया है।इसका मकसद ईरान की विमानन क्षमता और उससे जुड़े अंतरराष्ट्रीय कारोबारी नेटवर्क को सीमित करना है।
5. शिपिंग सेक्टर
ईरान के लिए शिपिंग और समुद्री परिवहन अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। खासकर तेल और अन्य वस्तुओं के परिवहन से जुड़े नेटवर्क पर प्रतिबंधों का असर ईरान की निर्यात क्षमता और विदेशी कमाई पर पड़ सकता है।
दूसरे देशों पर भी लग सकता है ‘सेकेंडरी सैंक्शन’
इस अमेरिकी कार्रवाई की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं है। अगर कोई विदेशी कंपनी या देश ऐसे कारोबार में शामिल होता है जिसे अमेरिका ने प्रतिबंधित किया है और जिससे ईरान को आर्थिक लाभ मिलता है, तो अमेरिका उस कंपनी या देश के खिलाफ भी सेकेंडरी प्रतिबंध लगा सकता है।इसका मतलब है कि किसी विदेशी कंपनी को सीधे अमेरिका में प्रतिबंधित न किया गया हो, फिर भी ईरान के साथ प्रतिबंधित कारोबार करने पर उस पर अमेरिकी कार्रवाई का खतरा पैदा हो सकता है।
डॉलर और अमेरिकी बैंकिंग सिस्टम बना सबसे बड़ा दबाव
अमेरिका के पास सबसे बड़ा आर्थिक हथियार उसकी डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था है। अगर किसी विदेशी कंपनी पर अमेरिकी प्रतिबंध लगते हैं, तो उसके लिए अमेरिकी बैंकों और कंपनियों के साथ कारोबार करना मुश्किल हो सकता है। कुछ परिस्थितियों में अमेरिकी वित्तीय प्रणाली तक उसकी पहुंच भी सीमित की जा सकती है। यही वजह है कि भारत, चीन, तुर्की और UAE जैसे देशों की कंपनियों के लिए ईरान के साथ कारोबार करते समय अमेरिकी प्रतिबंधों के जोखिम को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण हो जाता है।

अमेरिका ने ईरान को दिए ‘दो रास्ते’
अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट के अनुसार, अमेरिका ने ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ शुरू किया है। उनके बयान के मुताबिक ईरान के सामने दो रास्ते हैं—एक तरफ दुनिया से आर्थिक रूप से अलग-थलग पड़ने की स्थिति और दूसरी तरफ वैश्विक अर्थव्यवस्था में दोबारा सामान्य तरीके से शामिल होने का विकल्प। यानी अमेरिका आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए ईरान पर दबाव बढ़ाकर उसकी आर्थिक नीति और अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों में बदलाव चाहता है।
भारत पर कितना असर पड़ सकता है?
अमेरिका की कार्रवाई का भारत पर सीधा असर पड़ना तय नहीं है, लेकिन ईरान के साथ भारत के व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों को देखते हुए कुछ क्षेत्रों में दबाव बढ़ सकता है।
1. तेल
अगर भारत ईरान से कच्चा तेल खरीदता है या भविष्य में खरीद बढ़ाता है, तो अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भुगतान, बीमा, शिपिंग और वित्तीय लेन-देन मुश्किल हो सकते हैं।
2. चाबहार पोर्ट
ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक और कारोबारी रूप से महत्वपूर्ण है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बढ़ने से इस परियोजना से जुड़े कारोबार और निवेश पर अतिरिक्त सावधानी की जरूरत पड़ सकती है।
3. डॉलर में भुगतान
ईरान से जुड़े किसी कारोबार पर अमेरिकी वित्तीय प्रतिबंध लागू होने की स्थिति में डॉलर में भुगतान और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग चैनल प्रभावित हो सकते हैं।
4. भारत-ईरान व्यापार
ईरान के साथ कारोबार करने वाली भारतीय कंपनियों को अमेरिकी प्रतिबंधों और अनुपालन नियमों को ध्यान में रखना पड़ सकता है। इससे कुछ कारोबार की लागत और जोखिम बढ़ सकते हैं।
5. कूटनीतिक दबाव
अमेरिका भारत से भी ईरान के साथ आर्थिक संबंध सीमित करने को कह सकता है। हालांकि, भारत आम तौर पर अपने ऊर्जा हित, रणनीतिक जरूरतों और राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए विदेश नीति के फैसले करता है।
चीन, तुर्की और UAE पर भी नजर
ईरान के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में चीन, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। इसलिए अमेरिका की नई प्रतिबंध नीति का असर इन देशों की कंपनियों पर भी पड़ सकता है, खासकर अगर वे अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आने वाली गतिविधियों में शामिल होती हैं। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका किन विदेशी कंपनियों या देशों के खिलाफ आगे सेकेंडरी प्रतिबंध लगाएगा।
अमेरिका की रणनीति का असली मकसद क्या?
पूरे घटनाक्रम को आसान भाषा में समझें तो अमेरिका ईरान की अर्थव्यवस्था के उन रास्तों को बंद करना चाहता है, जिनसे ईरान को विदेशी मुद्रा, व्यापारिक लाभ और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक नेटवर्क तक पहुंच मिलती है। क्रिप्टो + सोना + टेक्नोलॉजी + एविएशन + शिपिंग पर दबाव बनाकर अमेरिका ईरान की अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों को सीमित करना चाहता है।अब बड़ा सवाल यह है कि ईरान इस दबाव का सामना कैसे करता है और उसके प्रमुख व्यापारिक साझेदार अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच किस रणनीति को अपनाते हैं।
