Anmol Sandesh News Desk, नई दिल्ली
Cyclone Names Explained: बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में उठने वाले चक्रवाती तूफानों के नाम आपने अक्सर सुने होंगे। कभी अम्फान, कभी बिपरजॉय, कभी अर्नब तो अब मुरासु। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इन तूफानों के नाम कौन रखता है? क्या भारत अपनी मर्जी से किसी भी चक्रवात का नाम रख सकता है? या फिर इसके पीछे कोई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था काम करती है?
दरअसल, दुनिया के अलग-अलग समुद्री क्षेत्रों में चक्रवातों के नाम रखने के लिए अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाएं बनाई गई हैं। भारत के आसपास यानी बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में बनने वाले चक्रवातों के नामकरण की जिम्मेदारी विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और संयुक्त राष्ट्र के एशिया एवं प्रशांत आर्थिक और सामाजिक आयोग (ESCAP) के तहत गठित पैनल की व्यवस्था के अनुसार होती है।
इस व्यवस्था में भारत समेत कुल 13 देश शामिल हैं। इन देशों ने मिलकर चक्रवातों के लिए 169 नामों की सूची तैयार की है। हर देश ने 13-13 नाम दिए हैं। यानी किसी तूफान का नाम अचानक नहीं रखा जाता, बल्कि पहले से स्वीकृत सूची में मौजूद नामों का निर्धारित क्रम से इस्तेमाल किया जाता है।
कौन रखता है चक्रवातों के नाम?
भारत के आसपास के समुद्री क्षेत्रों में बनने वाले चक्रवातों के नाम देने की जिम्मेदारी भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के नई दिल्ली स्थित क्षेत्रीय विशिष्ट मौसम विज्ञान केंद्र (RSMC) की है।
WMO/ESCAP के पैनल ऑन ट्रॉपिकल साइक्लोन के सदस्य देशों ने नामों की सूची तैयार की है। इस सूची को अप्रैल 2020 में अंतिम मंजूरी दी गई थी।
जब बंगाल की खाड़ी या अरब सागर में कोई मौसमी सिस्टम निर्धारित तीव्रता हासिल कर लेता है, तब IMD सूची के अगले उपलब्ध नाम के अनुसार उसे नाम देता है।
इसका मतलब है कि भारत के तट पर आने वाले हर तूफान का नाम भारत ही रखे, ऐसा जरूरी नहीं है। नामकरण पहले से तय अंतरराष्ट्रीय क्रम के अनुसार होता है।

मुरासु नाम भारत ने क्यों दिया?
हाल ही में चर्चा में आए चक्रवात मुरासु का नाम भारत ने दिया है। मुरासु तमिल भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ ढोल या नगाड़ा होता है।
भारत ने यह नाम 2020 में तैयार की गई सूची में पहले से प्रस्तावित किया था। इसलिए जब नामकरण के क्रम में भारत की बारी आई, तो मुरासु नाम का इस्तेमाल किया गया।
यहां सबसे दिलचस्प बात यह है कि चक्रवात का नाम इस आधार पर तय नहीं होता कि वह किस देश के तट से टकराने वाला है। नामों का इस्तेमाल पहले से निर्धारित क्रम के अनुसार किया जाता है।
अर्नब के बाद मुरासु ही क्यों आया?
चक्रवात अर्नब का नाम बांग्लादेश ने दिया था, जबकि मुरासु भारत की ओर से प्रस्तावित नाम है।
नामकरण की सूची में देशों को अंग्रेजी वर्णक्रम के अनुसार रखा गया है और नामों का इस्तेमाल कॉलम के क्रम में किया जाता है। इसी क्रम में बांग्लादेश का अर्नब आने के बाद भारत का मुरासु इस्तेमाल हुआ।
इसलिए आंध्र प्रदेश की ओर बढ़ रहे चक्रवात को मुरासु नाम मिला। इसका भारत की ओर बढ़ने या किसी खास इलाके से टकराने से कोई सीधा संबंध नहीं है।
इन 13 देशों के पास है चक्रवातों के नामकरण की जिम्मेदारी
उत्तर हिंद महासागर क्षेत्र में चक्रवातों के नामकरण के लिए कुल 13 देश मिलकर नामों की सूची तैयार करते हैं।
- बांग्लादेश
- भारत
- ईरान
- मालदीव
- म्यांमार
- ओमान
- पाकिस्तान
- कतर
- सऊदी अरब
- श्रीलंका
- थाईलैंड
- संयुक्त अरब अमीरात
- यमन
इन सभी देशों ने 13-13 नाम दिए हैं। इस तरह कुल 169 नामों की सूची तैयार की गई है। यह सूची बंगाल की खाड़ी और अरब सागर दोनों क्षेत्रों में बनने वाले चक्रवातों के लिए इस्तेमाल होती है।

चक्रवातों के नाम रखने के 7 बड़े नियम
तूफानों के नाम रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ खास मानक तय किए गए हैं। हर देश अपनी पसंद का कोई भी नाम सूची में शामिल नहीं करवा सकता।
- नाम छोटा और आसान होना चाहिए
नाम ऐसा होना चाहिए जिसे आम लोग आसानी से बोल और याद रख सकें।
- अधिकतम 8 अक्षरों की सीमा
प्रस्तावित नाम की लंबाई अधिकतम आठ अक्षर होनी चाहिए।
- किसी की भावनाओं को ठेस न पहुंचे
नाम ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे किसी देश, समुदाय या समाज की भावनाओं को नुकसान पहुंचे।
- राजनीति और धर्म से दूरी
नाम राजनीतिक व्यक्तियों, धार्मिक मान्यताओं, संस्कृति और जेंडर के प्रति निष्पक्ष होना चाहिए।
- नाम अपमानजनक नहीं होना चाहिए
किसी भी नाम का अर्थ अशिष्ट, क्रूर या आपत्तिजनक नहीं होना चाहिए।
- उच्चारण की जानकारी जरूरी
नाम के साथ उसका सही उच्चारण और वॉयस ओवर भी उपलब्ध कराना होता है, ताकि अलग-अलग देशों में उसका सही इस्तेमाल हो सके।
- एक बार इस्तेमाल हुआ नाम दोबारा नहीं
उत्तर हिंद महासागर क्षेत्र में एक बार इस्तेमाल किया गया चक्रवात का नाम दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जाता। नाम सूची से समाप्त हो जाता है।
इन मानकों के आधार पर WMO/ESCAP का पैनल नामों को मंजूरी देता है। जरूरत पड़ने पर किसी नाम की समीक्षा भी की जा सकती है।
आखिर चक्रवात को नाम कब दिया जाता है?
समुद्र में हर कम दबाव वाला क्षेत्र चक्रवात नहीं कहलाता और न ही हर मौसमी सिस्टम को तुरंत कोई नाम दे दिया जाता है।
IMD के नियमों के मुताबिक, उत्तर हिंद महासागर क्षेत्र में किसी सिस्टम को नाम तब दिया जाता है, जब उसकी अधिकतम निरंतर सतही हवा की गति कम से कम 34 नॉट यानी लगभग 62 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच जाती है।
इससे पहले सिस्टम को डिप्रेशन या डीप डिप्रेशन जैसी श्रेणियों में पहचाना जाता है। निर्धारित हवा की गति हासिल करने के बाद ही उसे सूची का अगला नाम दिया जाता है।
तूफानों के नाम रखने की जरूरत क्यों पड़ी?
चक्रवातों के नाम रखने का सबसे बड़ा उद्देश्य मौसम संबंधी चेतावनियों को आम लोगों तक आसानी से पहुंचाना है।
कल्पना कीजिए कि एक ही समुद्री क्षेत्र में एक से अधिक चक्रवात सक्रिय हों और हर बार मौसम विभाग को केवल तकनीकी नंबरों से उनकी पहचान करनी पड़े। ऐसी स्थिति में आम लोगों के लिए चेतावनियों को समझना मुश्किल हो सकता है।
नाम होने से किसी विशेष चक्रवात की पहचान आसान हो जाती है। मीडिया, मौसम वैज्ञानिकों, आपदा प्रबंधन टीमों और आम जनता के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान भी बेहतर होता है।
यही वजह है कि दुनिया के अलग-अलग समुद्री क्षेत्रों में चक्रवातों के नामकरण की अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाएं बनाई गई हैं।
