Anmol Sandesh News Desk, भोपाल
MP News: मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के 27 प्रतिशत आरक्षण को लेकर हाई कोर्ट के फैसले के बाद सियासत तेज हो गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस मामले में तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए जारी किया गया नोटिफिकेशन लचर और त्रुटिपूर्ण था। उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन सरकार ने जल्दबाजी में अध्यादेश लाया और इस प्रक्रिया में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से भी सलाह नहीं ली गई।
दरअसल, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 9 अक्टूबर 2026 को ओबीसी आरक्षण से जुड़ी याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए राज्य में 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को बरकरार रखने की मांग खारिज कर दी। अदालत ने ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत तक सीमित रखने का निर्णय दिया। साथ ही, विवाद के चलते रोके गए 13 प्रतिशत पदों पर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को तीन महीने के भीतर नियुक्ति देने के निर्देश दिए।
CM मोहन यादव बोले- जल्दबाजी में लाया गया था अध्यादेश
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाई कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2019 में अध्यादेश के माध्यम से ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का निर्णय लिया था। उनके मुताबिक, इस फैसले को लागू करने की प्रक्रिया में पर्याप्त सावधानी नहीं बरती गई और नोटिफिकेशन में कानूनी खामियां थीं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से सलाह नहीं लेने सहित कई पहलुओं पर सवाल उठते हैं। उन्होंने अदालत के फैसले को तत्कालीन कांग्रेस सरकार की आरक्षण नीति से जुड़ी प्रक्रिया पर सवाल खड़े करने वाला बताया। हालांकि, नोटिफिकेशन को त्रुटिपूर्ण बताना मुख्यमंत्री का राजनीतिक और कानूनी आकलन है। हाई कोर्ट के फैसले का कानूनी आधार अदालत के आदेश में दर्ज टिप्पणियों और निष्कर्षों से निर्धारित होता है।
हाई कोर्ट ने 27% आरक्षण की मांग क्यों खारिज की?
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के फैसले को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त असाधारण परिस्थितियां स्थापित नहीं होने की बात कही। अदालत ने आरक्षण की कुल 50 प्रतिशत सीमा से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी उल्लेख किया। अदालत के अनुसार, मामला ओबीसी वर्ग को आरक्षण देने का नहीं, बल्कि आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के औचित्य का था। हाई कोर्ट ने राज्य में सरकारी सेवाओं और उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत पर बनाए रखने का निर्देश दिया।
13 प्रतिशत होल्ड पदों पर तीन महीने में नियुक्ति के निर्देश
इस फैसले का एक अहम पहलू उन पदों से जुड़ा है, जिनकी नियुक्तियां 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को लेकर विवाद के कारण रोक दी गई थीं। भर्ती प्रक्रिया में अपनाए गए 87:13 फॉर्मूले के तहत 87 प्रतिशत पदों के परिणाम जारी किए गए थे, जबकि शेष 13 प्रतिशत पदों पर नियुक्तियां विवाद के समाधान तक लंबित थीं।
हाई कोर्ट ने भर्ती एजेंसियों को निर्देश दिया है कि रोके गए 13 प्रतिशत पदों पर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को तीन महीने के भीतर नियुक्ति दी जाए। इससे लंबे समय से परिणाम और नियुक्तियों का इंतजार कर रहे अभ्यर्थियों को राहत मिलने की उम्मीद है।
पहले से नियुक्त OBC अभ्यर्थियों को भी मिली राहत
हाई कोर्ट ने आरक्षण विवाद के दौरान की गई कुछ नियुक्तियों को लेकर भी निर्देश दिए हैं। मार्च 2019 से 29 सितंबर 2022 के बीच 27 प्रतिशत आरक्षण के आधार पर नियुक्त किए गए ओबीसी अभ्यर्थियों की नौकरी सुरक्षित रखने का निर्देश दिया गया है। अतिरिक्त नियुक्तियों के पदों को आगामी तीन भर्ती चक्रों में समायोजित करने की व्यवस्था भी बताई गई है।
वहीं, 29 सितंबर 2022 के बाद फैसले की तारीख तक की गई भर्तियों में 14 प्रतिशत से अधिक आरक्षण के तहत नियुक्तियों और लंबित पदों के संबंध में अदालत ने अलग निर्देश दिए हैं। इन निर्देशों का क्रियान्वयन संबंधित भर्ती प्रक्रिया और न्यायालय के आदेश के अनुसार होगा।
कमलनाथ सरकार ने 2019 में बढ़ाया था आरक्षण
मध्य प्रदेश में मार्च 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के लिए अध्यादेश लागू किया था। बाद में इस व्यवस्था को कानूनी रूप दिया गया, लेकिन इसके खिलाफ हाई कोर्ट में कई याचिकाएं दायर हुईं। मामला आगे सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा, जहां संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई के बाद मामले का निर्णय करने के लिए हाई कोर्ट को निर्देशित किया गया।
करीब सात साल तक चले इस विवाद पर अब हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है। अदालत के निर्णय के बाद राज्य में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत रहेगा, जबकि सरकार ने फैसले के कानूनी पहलुओं की समीक्षा कर आगे की कार्रवाई करने की बात कही है।
सरकार करेगी फैसले का विधिक परीक्षण
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार हाई कोर्ट के फैसले का विधिक परीक्षण करेगी और उसके बाद आगे की कानूनी कार्रवाई तय करेगी। ऐसे में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस मामले में आगे क्या कदम उठाती है और आरक्षण से जुड़े विभिन्न भर्ती प्रकरणों पर फैसले का किस तरह असर पड़ता है।
