Anmol Sandesh News Desk,नई दिल्ली
जलवायु परिवर्तन और अल-नीनो के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत के करोड़ों बच्चों के सामने नया संकट खड़ा हो गया है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) के हालिया आंकड़ों के अनुसार, देश के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लगभग 41 करोड़ बच्चे जलवायु और आपदा संबंधी गंभीर खतरों का सामना कर रहे हैं। इनमें कुपोषण, स्वास्थ्य समस्याएं, शिक्षा में बाधा और परिवारों की आजीविका पर संकट प्रमुख हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल मौसम से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक घटनाओं के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है, जो आने वाले वर्षों में बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर गहरा असर डाल सकता है।

क्या है अल-नीनो और क्यों बढ़ती है चिंता?
अल-नीनो एक वैश्विक जलवायु घटना है, जो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान के असामान्य रूप से बढ़ने से उत्पन्न होती है।सामान्य परिस्थितियों में पेरू और इक्वाडोर के तटों के पास ठंडा पानी ऊपर आता है, लेकिन अल-नीनो के दौरान व्यापारिक हवाएं (Trade Winds) कमजोर पड़ जाती हैं। इससे गर्म पानी पश्चिमी प्रशांत से पूर्वी प्रशांत की ओर फैल जाता है और वैश्विक मौसम चक्र प्रभावित होने लगता है।वैज्ञानिक दृष्टि से इसे ENSO (El Niño-Southern Oscillation) का गर्म चरण माना जाता है, जो आमतौर पर 2 से 7 वर्षों के अंतराल में दिखाई देता है।

भारत में क्यों बढ़ जाता है सूखे का खतरा?
अल-नीनो का सीधा प्रभाव भारतीय मानसून पर पड़ता है। इसके कारण—
- मानसून कमजोर हो सकता है
- बारिश में देरी हो सकती है
- सामान्य से कम वर्षा होती है
- कई क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति बन जाती है
कम बारिश का असर कृषि, जल स्रोतों, पशुपालन और खाद्य उत्पादन पर पड़ता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।
UNICEF के आंकड़े क्या कहते हैं?
UNICEF के अनुसार:
- भारत में 41.16 करोड़ बच्चे कम से कम दो जलवायु या आपदा संबंधी खतरों के संपर्क में हैं।
- इनमें से लगभग 97 प्रतिशत बच्चे सूखा और अत्यधिक गर्मी के संयुक्त खतरे का सामना कर रहे हैं।
- 15.88 करोड़ से अधिक बच्चे कुपोषण के बढ़े हुए जोखिम वाले क्षेत्रों में रहते हैं।
- कृषि और मौसम संबंधी सूखे से 41 करोड़ से ज्यादा बच्चे प्रभावित हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि सूखे के कारण फसलें खराब होती हैं, जल स्रोत सूखते हैं और पशुपालन प्रभावित होता है, जिससे परिवारों की आय घट जाती है तथा खाद्य सुरक्षा कमजोर पड़ती है।

बच्चों पर कुपोषण का गंभीर खतरा
कुपोषण इस संकट का सबसे गंभीर पहलू माना जा रहा है।
जब परिवारों के सामने भोजन की कमी होती है, तो सबसे पहले बच्चों का पोषण प्रभावित होता है। इससे—
- वजन और ऊंचाई का विकास रुक सकता है
- मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है
- प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर पड़ सकती है
- बार-बार बीमार पड़ने का खतरा बढ़ जाता है
UNICEF ने चेतावनी दी है कि गंभीर कुपोषण से जूझ रहे बच्चों में स्कूल छोड़ने और दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम अधिक होता है।

महिलाएं और नवजात भी प्रभावित
विशेषज्ञों के अनुसार सूखे का सबसे अधिक असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ता है।यदि गर्भवती महिलाओं को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता, तो नवजात शिशुओं का जन्म वजन कम हो सकता है। इसका प्रभाव बच्चे के पूरे जीवन पर पड़ सकता है।स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बाल कुपोषण केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास और मानव संसाधन से जुड़ा मुद्दा है।
आजीविका पर भी बड़ा संकट
सूखा केवल खेती तक सीमित नहीं रहता।
भारत की बड़ी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है। बारिश कम होने पर—
- खरीफ और रबी फसलों को नुकसान होता है
- मजदूरी के अवसर कम हो जाते हैं
- ग्रामीण आय घट जाती है
- पलायन बढ़ सकता है
UNICEF की रिपोर्ट के अनुसार कई प्रभावित क्षेत्रों में परिवार आर्थिक संकट के कारण बच्चों को पढ़ाई छोड़कर मजदूरी या घरेलू कामों में लगाने के लिए मजबूर हो सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन से और बढ़ेगी चुनौती
वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण भविष्य में अल-नीनो की घटनाएं अधिक तीव्र और बार-बार हो सकती हैं।बढ़ते तापमान और अनियमित मौसम पैटर्न के कारण सूखा, गर्मी और खाद्य संकट जैसी चुनौतियां और गंभीर हो सकती हैं।
क्या हैं समाधान?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट से निपटने के लिए बहुस्तरीय रणनीति की जरूरत है।
मुख्य उपाय:
- जल संरक्षण और जल संचयन को बढ़ावा
- सूखा-प्रतिरोधी फसलों का विकास
- पोषण कार्यक्रमों को मजबूत करना
- मौसम पूर्वानुमान प्रणाली में सुधार
- बच्चों और महिलाओं के लिए विशेष सहायता योजनाएं
- जलवायु अनुकूलन नीतियों को प्रभावी बनाना
सरकार, गैर-सरकारी संगठन और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इस दिशा में काम कर रही हैं, लेकिन चुनौती का दायरा काफी बड़ा है।

भविष्य की चेतावनी
विशेषज्ञों का कहना है कि 41 करोड़ बच्चों पर मंडराता यह खतरा केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि देश के भविष्य से जुड़ा सवाल है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ सकता है।स्वस्थ और पोषित बच्चे ही किसी भी देश की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। ऐसे में जलवायु परिवर्तन, सूखा और कुपोषण के खिलाफ सामूहिक प्रयास आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुके हैं।
