Anmol Sandesh News Desk | नई दिल्ली
दिल्ली हाई कोर्ट में बुधवार को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरभ दास और आशुतोष रांका की याचिका पर सुनवाई के दौरान तीखी टिप्पणियां सामने आईं। दोनों नेताओं ने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनकी हिरासत की अवधि बढ़ाई गई थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने बॉन्ड की शर्तों के कथित उल्लंघन और सीधे हाई कोर्ट का रुख करने पर सवाल उठाए। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने अपनी अर्जी वापस ले ली।
दिल्ली हाई कोर्ट ने क्यों लगाई फटकार?
सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रदर्शनकारियों के आचरण और कानूनी प्रक्रिया के पालन को लेकर सवाल किए। कोर्ट ने कहा कि जब प्रदर्शन के दौरान कुछ लोग सबसे आगे रहकर बैरिकेड तोड़ते हैं, तो बड़ी संख्या में मौजूद दूसरे लोगों के भी ऐसा करने की आशंका रहती है। ऐसी स्थिति में भीड़ को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं की ओर से बॉन्ड की शर्तों के कथित उल्लंघन पर भी सवाल उठाए। सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया गया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ कानूनी प्रक्रिया और निर्धारित शर्तों का पालन भी जरूरी है।
‘सीधे हाई कोर्ट क्यों आए?’ अदालत ने उठाया सवाल
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पूछा कि जब कानून में अपील और अन्य वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हैं, तो याचिकाकर्ताओं ने सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया?
अदालत ने कहा कि मामले से जुड़े कुछ पहलुओं पर फैसला स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) को करना है और याचिकाकर्ताओं को संबंधित कार्यवाही का पालन करने देना चाहिए।
अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट को रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है। हालांकि, वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध होने की स्थिति में अदालत मामले की परिस्थितियों के अनुसार यह विचार कर सकती है कि सीधे याचिका पर सुनवाई की जाए या नहीं।
‘पहले छात्र प्रदर्शन था, अब मुद्दा बदल गया’
सुनवाई के दौरान जस्टिस प्रसाद ने प्रदर्शन के उद्देश्य और उसमें शामिल लोगों की भूमिका को लेकर भी सवाल किए। अदालत ने याचिकाकर्ताओं की उम्र पूछी, जिस पर उनके वकील ने बताया कि सौरभ दास 27 वर्ष और आशुतोष रांका 32 वर्ष के हैं।
इसके बाद जज ने जेन-जी यानी नई पीढ़ी के संदर्भ में सवाल उठाते हुए प्रदर्शन की प्रकृति पर टिप्पणी की। अदालत की टिप्पणी का आशय था कि जुलाई में छात्र प्रदर्शन हुआ था, लेकिन अब उसके पीछे का मुद्दा बदलता दिखाई दे रहा है।
अदालत ने यह समझने की जरूरत पर जोर दिया कि प्रदर्शन में शामिल लोग कौन हैं, वे क्या करते हैं, किस संगठन से जुड़े हैं और संगठन का उद्देश्य क्या है।
यह टिप्पणी ऐसे समय में आई, जब प्रदर्शनकारियों की भूमिका, उनके संगठन और विरोध के उद्देश्य को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
13 अक्टूबर से जेल में बंद हैं दोनों नेता
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, सौरभ दास और आशुतोष रांका को दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर परिसर में प्रवेश करने के मामले में हिरासत में लिया था। इसके बाद दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेजा गया।
हालांकि, पांच दिन पूरे होने के बाद भी उनकी रिहाई नहीं हो सकी, क्योंकि उनकी न्यायिक हिरासत की अवधि बढ़ा दी गई थी। पुलिस की आशंका बताई गई कि रिहाई के बाद दोनों दोबारा कानून का उल्लंघन कर सकते हैं।
इसी हिरासत अवधि बढ़ाने के आदेश को चुनौती देते हुए दोनों नेताओं ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
CJP नेताओं ने क्यों वापस ली याचिका?
सुनवाई के दौरान अदालत ने वैकल्पिक कानूनी उपायों और SEM की कार्यवाही का पालन करने के मुद्दे पर सवाल उठाए। इसके बाद सौरभ दास और आशुतोष रांका की ओर से याचिका वापस लेने का निर्णय लिया गया।
याचिका वापस लिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि मामले के सभी आरोप सही साबित हो गए हैं या हिरासत से संबंधित विवाद का अंतिम निर्णय हो गया है। आगे की कानूनी स्थिति संबंधित मजिस्ट्रेट की कार्यवाही और उपलब्ध कानूनी विकल्पों पर निर्भर करेगी।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम कानून का पालन
इस सुनवाई में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन का सवाल भी सामने आया। अदालत ने स्वतंत्रता के महत्व को स्वीकार करते हुए यह संकेत दिया कि जहां वैकल्पिक कानूनी प्रक्रिया मौजूद है, वहां उसका उपयोग करने पर भी विचार किया जाना चाहिए।
