Anmol Sandesh News Desk,बैतूल
मध्य प्रदेश के बैतूल जिले की सतपुड़ा पर्वतमाला में बसा कुकरू गांव इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इसकी वजह सिर्फ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का प्रस्तावित दौरा नहीं, बल्कि यहां मौजूद मध्य भारत का इकलौता पारंपरिक कॉफी बागान भी है। प्राकृतिक खूबसूरती, ठंडा मौसम, घने जंगल और ऐतिहासिक कॉफी एस्टेट के कारण कुकरू को “मिनी पचमढ़ी” भी कहा जाता है। स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि मुख्यमंत्री के दौरे के बाद यह इलाका पर्यटन और कॉफी उत्पादन के क्षेत्र में नई पहचान बना सकता है।

1944 में अंग्रेज महिला ने शुरू की थी कॉफी की खेती
कुकरू की सबसे बड़ी पहचान यहां का ऐतिहासिक कॉफी एस्टेट है। वर्ष 1944 में ब्रिटिश महिला फ्लोरेंस हैंड्रिक्स ने यहां करीब 44 हेक्टेयर (160 एकड़) क्षेत्र में कॉफी की खेती शुरू कराई थी। सतपुड़ा की जलवायु और उपजाऊ मिट्टी कॉफी उत्पादन के लिए बेहद अनुकूल साबित हुई और कुछ ही वर्षों में यहां उच्च गुणवत्ता वाली अरेबिका कॉफी तैयार होने लगी।
अब भी जिंदा है अंग्रेजों के दौर का कॉफी बागान
आजादी के बाद यह कॉफी एस्टेट वन विभाग के अधीन आ गया। समय के साथ संरक्षण और निवेश की कमी के कारण उत्पादन में लगातार गिरावट आई। जहां पहले हर साल 80 से 100 क्विंटल कॉफी बीन्स का उत्पादन होता था, वहीं अब यह घटकर 8 से 10 क्विंटल रह गया है। इसके बावजूद यहां तैयार होने वाली अरेबिका कॉफी की गुणवत्ता इतनी अच्छी मानी जाती है कि इसे निर्यात योग्य बताया गया है और कई विदेशी कंपनियां भी इसमें रुचि दिखा चुकी हैं।
GI टैग मिलने से बदल सकती है तस्वीर
मध्य प्रदेश सरकार ने कुकरू कॉफी सहित राज्य के 38 उत्पादों के लिए GI टैग का आवेदन किया है। यदि कुकरू कॉफी को GI टैग मिल जाता है तो इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान मिलेगी। इससे स्थानीय किसानों, आदिवासी समुदायों और कॉफी उत्पादकों की आय में बड़ा इजाफा हो सकता है।
क्यों खास है कुकरू?
समुद्र तल से करीब 3668 फीट की ऊंचाई पर बसे कुकरू की प्राकृतिक सुंदरता इसे खास बनाती है।
- घने जंगल और सतपुड़ा की हरी-भरी वादियां
- मानसून और सर्दियों में हिल स्टेशन जैसा मौसम
- शानदार सनराइज और सनसेट पॉइंट
- समृद्ध जैव विविधता और वन्य क्षेत्र
- कोरकू जनजाति की अनूठी संस्कृति और परंपराएं
इसी वजह से इसे बैतूल का “मिनी पचमढ़ी” कहा जाता है।
स्थानीय स्वाद भी बनेगा पहचान
कुकरू सिर्फ कॉफी तक सीमित नहीं है। यहां कोदो-कुटकी, रबड़ी, मावा, वन उत्पाद और पारंपरिक आदिवासी व्यंजन भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। प्रशासन “कुकरू ब्रांड” विकसित करने और वन धन योजना के तहत स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग की दिशा में काम कर रहा है।
रोजगार के नए अवसर खुलेंगे
यदि यहां कॉफी प्रोसेसिंग यूनिट, कैफे, होम-स्टे, एडवेंचर टूरिज्म और पर्यटन सुविधाएं विकसित होती हैं तो हजारों स्थानीय युवाओं को रोजगार मिल सकता है। फिलहाल यहां तैयार होने वाली कॉफी की प्रोसेसिंग दूसरे शहरों में करनी पड़ती है।

पर्यटन सर्किट बनाने की तैयारी
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं बैतूल विधायक हेमंत खंडेलवाल के अनुसार, कुकरू को बड़ा पर्यटन केंद्र बनाने की योजना तैयार की जा रही है। प्रस्तावित पर्यटन सर्किट में—
- कुकरू कॉफी एस्टेट
- मुक्तागिरी जैन तीर्थ
- महाराष्ट्र का चिखलदरा हिल स्टेशन
को जोड़ा जाएगा, जिससे देशभर के पर्यटक इस क्षेत्र की ओर आकर्षित होंगे।
कैसे पहुंचे कुकरू?
🚗 सड़क मार्ग
- बैतूल से लगभग 90 किमी
- भैंसदेही से लगभग 30 किमी
🚆 रेल मार्ग
- निकटतम रेलवे स्टेशन: बैतूल
️ हवाई मार्ग
- नागपुर एयरपोर्ट
- भोपाल एयरपोर्ट
CM मोहन यादव के दौरे से बढ़ीं उम्मीदें
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रस्तावित दौरे को लेकर पूरे क्षेत्र में उत्साह का माहौल है। स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि कॉफी एस्टेट के संरक्षण, GI टैग, प्रोसेसिंग यूनिट, पर्यटन विकास और आधारभूत सुविधाओं को लेकर बड़ी घोषणाएं हो सकती हैं। यदि ऐसा होता है तो कुकरू आने वाले वर्षों में मध्य प्रदेश का कॉफी हब, ईको-टूरिज्म डेस्टिनेशन और आदिवासी संस्कृति का प्रमुख केंद्र बन सकता है।




