Anmol Sandesh News Desk, नई दिल्ली
1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामले में दोषी ठहराए गए पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार के निधन के बाद दिल्ली की सियासत में नया विवाद खड़ा हो गया है। सज्जन कुमार के परिवार के प्रति संवेदना जताने उनके घर पहुंचे भाजपा के तीन लोकसभा सांसदों—रामवीर सिंह बिधूड़ी, योगेंद्र चंदोलिया और कमलजीत सहरावत को लेकर राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं। मामला इसलिए संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि सज्जन कुमार 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में दोषी ठहराए गए थे और निधन के समय तिहाड़ जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे थे। उनका 20 अगस्त 2026 को सफदरजंग अस्पताल में निधन हुआ था।
तीन BJP सांसदों के घर पहुंचने पर क्यों मचा बवाल?
रिपोर्टों के मुताबिक दक्षिणी दिल्ली से सांसद रामवीर सिंह बिधूड़ी, उत्तर-पश्चिम दिल्ली से सांसद योगेंद्र चंदोलिया और पश्चिमी दिल्ली से सांसद कमलजीत सहरावत हाल ही में सज्जन कुमार के परिवार से मिलने उनके घर पहुंचे और निधन पर संवेदना व्यक्त की। इन सांसदों के इस दौरे की जानकारी सामने आने के बाद 1984 दंगा पीड़ितों के लिए लंबे समय से आवाज उठाने वाले वरिष्ठ वकील HS फुल्का ने इसकी कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि 1984 के पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना होनी चाहिए, न कि उस व्यक्ति के प्रति जो दंगों के मामलों में दोषी ठहराया गया था। उन्होंने तीनों सांसदों के बहिष्कार की अपील भी की। इस विवाद ने BJP के सामने राजनीतिक असहजता की स्थिति पैदा कर दी है, क्योंकि पार्टी लंबे समय से 1984 के दंगों के पीड़ितों को न्याय दिलाने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करती रही है।
BJP सांसदों की सफाई क्या है?
इस विवाद के बीच BJP की ओर से यह कहा गया है कि तीनों सांसद पार्टी के प्रतिनिधि के तौर पर नहीं, बल्कि निजी हैसियत से सज्जन कुमार के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करने पहुंचे थे। इस स्पष्टीकरण के बावजूद मामला राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है। यही वजह है कि अब सवाल उठ रहा है कि क्या किसी मृत व्यक्ति के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करना और उसके राजनीतिक या आपराधिक अतीत का समर्थन करना एक ही बात माना जा सकता है? दूसरी ओर, 1984 के पीड़ित परिवारों का तर्क है कि ऐसे मामलों में सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों को संवेदना व्यक्त करते समय विशेष राजनीतिक और सामाजिक संवेदनशीलता बरतनी चाहिए।
HS फुल्का ने क्यों जताई नाराजगी?
HS फुल्का ने सोशल मीडिया पर तीनों सांसदों के दौरे की आलोचना करते हुए कहा कि 1984 के पीड़ितों और उनके परिवारों की पीड़ा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनके मुताबिक, कई परिवार आज भी उस दौर की हिंसा और अपने परिजनों को खोने का दर्द झेल रहे हैं। फुल्का की प्रतिक्रिया के बाद यह मुद्दा दिल्ली से निकलकर राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।
सज्जन कुमार कौन थे और मामला क्या था?
सज्जन कुमार दिल्ली की राजनीति में लंबे समय तक प्रभावशाली कांग्रेस नेता रहे और तीन बार लोकसभा सांसद रहे। 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली और देश के कई हिस्सों में सिख विरोधी हिंसा हुई थी। इस हिंसा में हजारों लोगों की जान गई थी। सज्जन कुमार को 1984 की हिंसा से जुड़े मामलों में दोषी ठहराया गया और उन्हें उम्रकैद की सजा मिली। 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें पांच सिखों की हत्या और गुरुद्वारे को जलाने से जुड़े मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद फरवरी 2025 में सरस्वती विहार में जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह की हत्या के मामले में भी उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई। हालांकि, 2026 में उन्हें 1984 से जुड़े कुछ अन्य मामलों में बरी भी किया गया था। इसलिए उनके खिलाफ अलग-अलग मामलों की कानूनी स्थिति को अलग-अलग देखना जरूरी है।
20 अगस्त को तिहाड़ में हुई थी मौत
सज्जन कुमार तिहाड़ जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे थे। 20 अगस्त को तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। अस्पताल के मुताबिक उन्हें सुबह अस्पताल लाया गया था और उपचार एवं जीवनरक्षक प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके निधन के बाद ही उनके परिवार के प्रति संवेदना जताने वाले नेताओं को लेकर राजनीतिक बहस शुरू हो गई।
कांग्रेस नेता दीपेंद्र हुड्डा को लेकर भी विवाद
इस विवाद का दूसरा पहलू भी सामने आया है। कांग्रेस सांसद दीपेंद्र हुड्डा का नाम भी सज्जन कुमार से जुड़ी हालिया राजनीतिक बहस में आया। हालांकि, हुड्डा ने उन दावों का खंडन किया है कि उन्होंने सज्जन कुमार को ‘रोल मॉडल’ बताया था। उन्होंने कहा कि उनके शब्दों को गलत तरीके से पेश किया गया। यानी मामला सिर्फ BJP तक सीमित नहीं रहा है। सज्जन कुमार की विरासत और 1984 के दंगों को लेकर कांग्रेस और BJP दोनों पर राजनीतिक सवाल उठ रहे हैं।
अब आगे क्या?
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि तीनों BJP सांसदों के इस दौरे को पार्टी किस तरह देखती है और क्या इस मामले में उनके खिलाफ कोई औपचारिक संगठनात्मक कार्रवाई होती है। वहीं दूसरी ओर 1984 दंगा पीड़ित परिवारों और सिख संगठनों की नाराजगी इस मुद्दे को और संवेदनशील बना रही है। राजनीतिक दलों के लिए यह सिर्फ किसी नेता के निधन पर संवेदना का मामला नहीं, बल्कि 1984 के दंगों की न्याय प्रक्रिया और पीड़ित परिवारों की भावनाओं से जुड़ा बेहद संवेदनशील मुद्दा है।
