
नई दिल्ली (अनमोल संदेश डिजिटल).:
देशभर की न्यायिक व्यवस्था में लंबित मामलों और फैसलों में देरी को लेकर Supreme Court of India ने बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट्स को निर्देश दिया है कि किसी भी मामले में फैसला रिजर्व रखने के बाद उसे अधिकतम 3 महीने के भीतर सुनाया जाए।मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant, जस्टिस विपुल एम. पंचोली और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि खासकर जमानत मामलों में आदेश तुरंत सुनाए जाएं। यदि किसी कारण से फैसला सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अगले दिन तक अनिवार्य रूप से जारी करना होगा।
वेबसाइट पर दिखानी होगी रिजर्व फैसलों की जानकारी:
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी हाईकोर्ट यह जानकारी अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक करेंगे कि किस तारीख को किसी मामले में बहस पूरी हुई और फैसला रिजर्व रखा गया। इससे मामलों की पारदर्शिता बढ़ेगी और देरी पर निगरानी रखी जा सकेगी।
किस मामले में आया यह आदेश:
यह निर्देश शुक्रवार को झारखंड सरकार और पिला पहन से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान दिए गए। याचिका में कहा गया था कि हाईकोर्ट ने फैसला सुनाने के बावजूद आदेश अपलोड नहीं किया था, जिससे पक्षकारों को परेशानी हुई।
सुप्रीम कोर्ट के अहम निर्देश:
- निचली अदालतों को जमानत मामलों में दिए गए आदेशों की जानकारी संबंधित हाईकोर्ट को देनी होगी।
- फैसलों का ऑपरेटिव हिस्सा (Action Taken Portion) खुली अदालत में सुनाना जरूरी होगा।
- विस्तृत आदेश 7 दिनों के भीतर वेबसाइट पर अपलोड करना होगा।
- यदि मुख्य आदेश 15 दिनों तक अपलोड नहीं होता है, तो संबंधित पक्ष आवेदन दे सकेगा।
- 30 दिनों के भीतर भी आदेश अपलोड नहीं होने पर मामला दूसरी बेंच को ट्रांसफर करने की मांग की जा सकेगी।
देश की अदालतों में लंबित मामलों का बोझ:
देश की अदालतों में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। केंद्र सरकार ने दिसंबर 2025 में संसद में जानकारी दी थी कि देशभर की अदालतों में कुल 5.49 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं।
इनमें:
- सुप्रीम कोर्ट में लगभग 92 हजार से ज्यादा केस पेंडिंग हैं।
- देश के 25 हाईकोर्ट्स में 63 लाख से अधिक मामले लंबित हैं।
कोविड महामारी के बाद ई-फाइलिंग बढ़ने और नए मामलों की संख्या में तेजी आने से न्याय व्यवस्था पर दबाव और बढ़ा है।
न्यायिक पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम:
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के ये निर्देश न्यायिक प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। इससे फैसलों में अनावश्यक देरी कम होगी और लोगों को समय पर न्याय मिलने में मदद मिलेगी।
