Anmol Sandesh News Desk,तेहरान
अमेरिका और ईरान के बीच दशकों पुराना तनाव एक बार फिर सुर्खियों में है। युद्धविराम और कूटनीतिक प्रयासों की चर्चाओं के बावजूद दोनों देशों के बीच टकराव कम होने के बजाय और जटिल होता दिखाई दे रहा है। हाल के दिनों में अमेरिकी हवाई हमलों, ईरानी जवाबी कार्रवाई और होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव ने पूरे मध्य पूर्व की स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

हालिया घटनाक्रम ने बढ़ाई चिंता
क्षेत्रीय तनाव के बीच अमेरिका ने सप्ताहांत में ईरान से जुड़े ठिकानों पर कई हवाई हमले किए। वाशिंगटन ने इन्हें “रक्षात्मक कार्रवाई” बताया। दूसरी ओर, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने अमेरिकी हितों को निशाना बनाने की जिम्मेदारी लेते हुए दावा किया कि उसने अमेरिका द्वारा उपयोग किए जा रहे एक हवाई अड्डे पर हमला किया है।यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब दोनों देशों के बीच युद्धविराम को लेकर बातचीत चल रही थी, लेकिन अब तक किसी ठोस समाधान के संकेत नहीं मिले हैं।
50 साल पुरानी दुश्मनी
अमेरिका और ईरान के संबंध हमेशा ऐसे नहीं थे। ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रजा पहलवी के दौर में दोनों देश करीबी सहयोगी थे। लेकिन 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद सत्ता परिवर्तन ने रिश्तों को पूरी तरह बदल दिया और दोनों देशों के बीच गहरा अविश्वास पैदा हो गया।इसके बाद बंधक संकट, आर्थिक प्रतिबंध, परमाणु कार्यक्रम को लेकर विवाद और क्षेत्रीय संघर्षों में विरोधी पक्षों का समर्थन, दोनों देशों के रिश्तों को लगातार खराब करते रहे।
परमाणु कार्यक्रम और मिसाइलें बनीं विवाद की जड़
अमेरिका लंबे समय से ईरान पर परमाणु हथियार विकसित करने की कोशिशों का आरोप लगाता रहा है। वहीं ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है।इसके साथ ही ईरान का विशाल बैलिस्टिक मिसाइल नेटवर्क भी वाशिंगटन और उसके सहयोगियों की चिंता का विषय बना हुआ है। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि ईरान की मिसाइल क्षमताएं क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं और इन्हें सीमित करना आवश्यक है।
भूमिगत सैन्य ढांचे ने बढ़ाई चुनौती
विशेषज्ञों के अनुसार ईरान ने पिछले दो दशकों में भूमिगत मिसाइल अड्डों और सुरंगों का व्यापक नेटवर्क तैयार किया है। इनमें से कई ठिकाने पहाड़ों और चट्टानों के सैकड़ों मीटर नीचे स्थित हैं, जिससे उन्हें नष्ट करना बेहद कठिन हो जाता है।इसी कारण अमेरिका और उसके सहयोगी सीधे अंदरूनी ठिकानों को निशाना बनाने के बजाय प्रवेश मार्गों, लॉन्च साइट्स और आपूर्ति श्रृंखला पर हमले कर रहे हैं।

आर्थिक दबाव और क्षेत्रीय राजनीति
अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों ने ईरानी अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर डाला है। महंगाई, मुद्रा अवमूल्यन और बेरोजगारी ने देश के भीतर आर्थिक चुनौतियां बढ़ाई हैं।इसके बावजूद ईरान ने अपने क्षेत्रीय प्रभाव को बनाए रखा है और लेबनान, सीरिया, इराक तथा यमन में सहयोगी समूहों के माध्यम से अपनी रणनीतिक मौजूदगी कायम रखी है।
क्या निकल पाएगा समाधान?
हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में कुछ प्रगति की खबरें सामने आईं, लेकिन जमीनी स्तर पर सैन्य गतिविधियां जारी हैं। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके राष्ट्रीय हितों की गारंटी के बिना किसी समझौते की संभावना नहीं है।विश्लेषकों का मानना है कि दोनों पक्ष फिलहाल “नियंत्रित तनाव” की रणनीति अपना रहे हैं। अमेरिका दबाव बनाकर ईरान से रियायतें चाहता है, जबकि ईरान प्रत्यक्ष युद्ध से बचते हुए मिसाइलों, ड्रोन और सहयोगी समूहों के जरिए जवाबी क्षमता बनाए रखना चाहता है।

मध्य पूर्व के लिए बड़ा खतरा
सबसे बड़ी चिंता यह है कि कोई भी छोटी सैन्य घटना बड़े क्षेत्रीय संघर्ष का रूप ले सकती है। होर्मुज जलडमरूमध्य, तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। यदि तनाव और बढ़ता है तो इसके असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है।
निष्कर्ष
अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष अब केवल राजनीतिक बयानबाजी या आर्थिक प्रतिबंधों तक सीमित नहीं है। यह सैन्य, आर्थिक और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का बहुआयामी संघर्ष बन चुका है। कूटनीतिक प्रयास जारी हैं, लेकिन दोनों देशों की रणनीति फिलहाल टकराव और बातचीत को साथ-साथ आगे बढ़ाने की दिख रही है। ऐसे में मध्य पूर्व एक बार फिर अनिश्चितता और संभावित संकट के दौर में प्रवेश करता नजर आ रहा है।
