Anmol Sandesh News Desk,वॉशिंगटन
रूस के खिलाफ अमेरिका की रणनीति अब और आक्रामक होती दिखाई दे रही है। अमेरिकी सीनेट ने रूस और ईरान के खिलाफ नए प्रतिबंधों से जुड़े एक महत्वपूर्ण विधेयक को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है।विधेयक के पक्ष में 86 सीनेटरों ने मतदान किया, जबकि 11 ने इसका विरोध किया। इस प्रस्ताव में उन देशों से आने वाले सामान पर भारी अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रावधान है, जो रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदते हैं।इसी वजह से भारत और चीन इस प्रस्ताव के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से में आ जाते हैं।
क्या भारत पर लगेगा 100% टैरिफ?
यहां सबसे जरूरी बात यह है कि अभी भारत पर 100% टैरिफ लागू नहीं हुआ है।सीनेट से पारित विधेयक अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदार देशों से आने वाले उत्पादों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रस्ताव रखता है।यानी अगर यह विधेयक अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से भी पास होकर कानून बनता है और राष्ट्रपति इसका इस्तेमाल करते हैं, तभी ऐसी कार्रवाई आगे बढ़ सकती है।भारत और चीन रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदने वाले देशों में शामिल हैं, इसलिए दोनों देश इस प्रस्ताव के संभावित प्रभाव के दायरे में आ सकते हैं।
भारत पर क्यों पड़ सकता है असर?
भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। रूस से मिलने वाला तेल भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण रहा है।अमेरिकी सांसदों का तर्क है कि रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाकर मॉस्को की तेल और गैस से होने वाली कमाई को प्रभावित किया जा सकता है।अमेरिका की रणनीति का उद्देश्य रूस पर यूक्रेन युद्ध समाप्त करने के लिए आर्थिक और राजनीतिक दबाव बढ़ाना है।अगर भविष्य में प्रस्तावित टैरिफ लागू होते हैं, तो भारत से अमेरिका को निर्यात होने वाले कुछ उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लग सकता है।इसका असर उन भारतीय कंपनियों पर पड़ सकता है जिनका कारोबार अमेरिकी बाजार पर काफी निर्भर है।
भारत के साथ चीन भी निशाने पर
भारत अकेला देश नहीं है। चीन भी रूस का बड़ा ऊर्जा खरीदार है और इसलिए प्रस्ताव में उसका नाम भी महत्वपूर्ण है।इसके अलावा रूस से ऊर्जा खरीदने वाले अन्य देशों में अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया जैसे देशों का भी उल्लेख किया गया है।अमेरिकी सांसदों का मानना है कि रूस के ऊर्जा ग्राहकों पर दबाव बढ़ाने से रूसी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा और इससे यूक्रेन युद्ध को लेकर मॉस्को पर दबाव बनाया जा सकेगा।
अभी कानून नहीं बना, आगे क्या होगा?
सीनेट की मंजूरी के बाद भी यह विधेयक अभी अमेरिकी कानून नहीं बना है।अब इसे हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स यानी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में जाना है।वहां से पारित होने के बाद ही यह राष्ट्रपति के पास जाएगा। इसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और प्रस्ताव में दिए अधिकारों के इस्तेमाल के आधार पर आगे की कार्रवाई संभव होगी।यानी फिलहाल 100% टैरिफ की खबर को संभावित कार्रवाई के तौर पर देखना चाहिए, तत्काल लागू होने वाले शुल्क के रूप में नहीं।
रूस पर 500% तक टैरिफ का भी प्रस्ताव
विधेयक में रूस से जुड़े आर्थिक दबाव का दायरा काफी बड़ा रखा गया है।प्रस्ताव में रूसी निर्यात से जुड़े कुछ सामान पर 500% तक टैरिफ लगाने का प्रावधान भी शामिल है।इसके अलावा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के खिलाफ नए प्रतिबंध लगाने तथा वीजा प्रतिबंधों जैसे कदमों का भी प्रस्ताव है।यानी अमेरिका की प्रस्तावित रणनीति सिर्फ व्यापारिक शुल्क तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें व्यक्तिगत प्रतिबंध, वीजा कार्रवाई और आर्थिक प्रतिबंध भी शामिल हैं।
ईरान भी विधेयक के दायरे में
यह प्रस्ताव सिर्फ रूस के खिलाफ नहीं है। इसमें ईरान को लेकर भी कई प्रावधान शामिल हैं।ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई का प्रस्ताव रखा गया है।इस तरह यह विधेयक रूस और ईरान दोनों पर अमेरिकी आर्थिक दबाव बढ़ाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
भारत के लिए आगे की चुनौती क्या?
अगर यह विधेयक अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से पारित होकर कानून बनता है और राष्ट्रपति इसके तहत टैरिफ लगाने का फैसला करते हैं, तो भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर दबाव बढ़ सकता है।खासकर उन भारतीय निर्यातकों को चिंता हो सकती है जिनके लिए अमेरिकी बाजार बड़ा व्यापारिक केंद्र है।हालांकि, वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम कानून में क्या प्रावधान रहते हैं और अमेरिकी प्रशासन उनका इस्तेमाल किस तरह करता है।
अब नजर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा और ट्रंप के अगले कदम पर
अमेरिकी सीनेट ने रूस-ईरान प्रतिबंधों वाले विधेयक को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। इसमें रूस के बड़े ऊर्जा खरीदार देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की संभावित शक्ति का प्रावधान है।
लेकिन फिलहाल यह याद रखना जरूरी है—
* भारत पर 100% टैरिफ अभी लागू नहीं हुआ है।
* विधेयक को अभी प्रतिनिधि सभा से गुजरना है।
* अंतिम फैसला अमेरिकी कानून और राष्ट्रपति की कार्रवाई पर निर्भर करेगा।
अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि अमेरिकी प्रतिनिधि सभा इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाती है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आगे क्या फैसला लेते हैं।
